
अमेरिका बनाम चीन: ईरान से तेल व्यापार पर छिड़ी ‘जंग’, ड्रैगन ने वाशिंगटन के प्रतिबंधों को कचरे के डिब्बे में डाला
ईरान और अमेरिका के बीच 28 फरवरी 2026 से शुरू हुआ सैन्य संघर्ष भले ही 18 अप्रैल से ‘सीजफायर’ की दहलीज पर खड़ा हो, लेकिन आर्थिक मोर्चे पर घमासान और तेज हो गया है। वाशिंगटन इस ताक में है कि तेहरान को आर्थिक रूप से पंगु बना दिया जाए। होर्मुज जलडमरूमध्य की नाकेबंदी के बीच अमेरिका उन विदेशी जहाजों और कंपनियों पर गाज गिरा रहा है जो ईरान के साथ व्यापार कर रहे हैं। इसी क्रम में अमेरिका ने ईरान से सस्ता तेल खरीदने के आरोप में चीन की पांच दिग्गज कंपनियों पर कड़े प्रतिबंध जड़ दिए हैं। वैश्विक ऊर्जा संकट के इस दौर में चीन ने अमेरिका की इस ‘घेराबंदी’ पर बेहद कड़ा और दो टूक पलटवार किया है।
चीनी वाणिज्य मंत्रालय ने शनिवार को एक कड़ा आधिकारिक बयान जारी कर दुनिया को स्पष्ट संदेश दे दिया है। बीजिंग ने साफ कहा कि ईरानी तेल खरीदने वाली उसकी पांच कंपनियों पर लगाए गए अमेरिकी प्रतिबंधों को चीन न तो मान्यता देगा, न इन्हें लागू करेगा और न ही इनका पालन किया जाएगा। चीन ने अमेरिकी कार्रवाई को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि ये प्रतिबंध अंतरराष्ट्रीय कानूनों की कसौटी पर कहीं नहीं टिकते। बीजिंग ने अपनी संस्थाओं को निर्देश दिया है कि वे इन अमेरिकी आदेशों को पूरी तरह नजरअंदाज करें।
चीन ने वाशिंगटन की इस कार्रवाई को ‘लॉन्ग-आर्म ज्यूरिस्डिक्शन’ (अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर धौंस जमाना) का क्लासिक उदाहरण बताया है। मंत्रालय का तर्क है कि ये प्रतिबंध चीनी कंपनियों के वैध अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक अधिकारों का हनन हैं। चीन के मुताबिक, यह न केवल अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन है, बल्कि संप्रभु देशों के संबंधों के मूल सिद्धांतों पर भी प्रहार है। बीजिंग ने दोहराया कि वह हमेशा से संयुक्त राष्ट्र की बिना मंजूरी वाले एकतरफा प्रतिबंधों का विरोधी रहा है और भविष्य में भी रहेगा।
अमेरिका की ‘ब्लैकलिस्ट’ में शामिल कंपनियां
वाशिंगटन ने जिन पांच चीनी कंपनियों को निशाना बनाया है, उनमें मुख्य रूप से शानदोंग प्रांत की तीन कंपनियां—शानदोंग जिनचेंग पेट्रोकेमिकल ग्रुप, शानदोंग शौगुआंग लुकिंग पेट्रोकेमिकल और शानदोंग शेंगशिंग केमिकल शामिल हैं। इनके अलावा हेंगली पेट्रोकेमिकल (दालियान) रिफाइनरी और हेबेई शिनहाई केमिकल ग्रुप पर भी पाबंदियां लगाई गई हैं। इतना ही नहीं, शुक्रवार को किंगदाओ हाईये ऑयल टर्मिनल कंपनी लिमिटेड पर भी गाज गिरी। आरोप है कि इस कंपनी ने पिछले साल फरवरी से अब तक ईरान से करोड़ों बैरल कच्चा तेल मंगवाया, जिससे तेहरान की झोली में अरबों डॉलर पहुंचे।
ईरान का सबसे बड़ा ‘तेल मददगार’ है चीन
इन प्रतिबंधों ने बीजिंग के गुस्से को सातवें आसमान पर पहुंचा दिया है। दरअसल, चीन वेनेजुएला और ईरान जैसे देशों के तेल का सबसे बड़ा खरीदार है। अमेरिका ने जनवरी में वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को सत्ता से हटाने की कोशिशों के बाद वहां के तेल पर परोक्ष नियंत्रण कर लिया था, और अब उसका अगला लक्ष्य ईरान है। चीन अपनी छोटी स्वतंत्र रिफाइनरियों, जिन्हें ‘टीपॉट रिफाइनरी’ कहा जाता है, के जरिए ईरान से रियायती दरों पर भारी मात्रा में तेल आयात करता है। अमेरिका ने जानबूझकर इन्हीं कंपनियों की रग दबाई है।
चीन की दलील: हमारा व्यापार पूरी तरह ‘लीगल’
ईरान की तेल से होने वाली कमाई को शून्य पर लाने के लिए अमेरिका ने अपनी सख्ती बढ़ा दी है। हालांकि, चीन इसे ‘अत्यधिक दखलंदाजी’ मान रहा है। चीनी अधिकारियों ने स्पष्ट किया है कि ऊर्जा के क्षेत्र में होने वाले व्यापारिक सहयोग को राजनीति का अखाड़ा नहीं बनाया जाना चाहिए। बीजिंग ने वाशिंगटन को चेतावनी भरे लहजे में कहा है कि वह इन कदमों को तुरंत वापस ले। चीन का दावा है कि दो संप्रभु राष्ट्रों के बीच होने वाला यह व्यापार पूरी तरह से वैध और पारदर्शी है, जिसमें तीसरे पक्ष के हस्तक्षेप की कोई जगह नहीं है।
प्रतिबंधों का पुराना इतिहास और वर्तमान तनाव
अमेरिका और ईरान के बीच प्रतिबंधों की यह जंग कोई नई नहीं है। 1979 में दूतावास बंधक संकट के बाद शुरू हुआ यह सिलसिला 1995, 2011 और 2018 में और कड़ा होता गया। लेकिन 2026 के ये प्रतिबंध अलग हैं, क्योंकि इस बार दोनों देश सीधे युद्ध के मैदान में आमने-सामने हैं। अमेरिका इस बार ईरान को रत्ती भर भी रियायत देने के मूड में नहीं है और इसी रणनीति के तहत वह ईरान के व्यापारिक साझेदारों पर दबाव बना रहा है।
ऑयल ट्रेड बना महाशक्तियों के बीच टकराव की वजह
28 फरवरी से जारी इस युद्ध ने वाशिंगटन और तेहरान के बीच कूटनीति के सारे दरवाजे बंद कर दिए हैं। ऐसे समय में जब दुनिया की दो महाशक्तियां—चीन और अमेरिका—तेल की आपूर्ति को लेकर आमने-सामने हैं, तनाव बढ़ना लाजिमी है। दिलचस्प बात यह है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इसी महीने चीन की यात्रा पर जाने वाले हैं, जहां उनकी राष्ट्रपति शी जिनपिंग से मुलाकात होगी। विशेषज्ञ इस तनातनी को वार्ता से पहले की ‘पावर टेस्टिंग’ के रूप में देख रहे हैं।
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फिलहाल, इस गतिरोध का सीधा असर वैश्विक तेल बाजार पर पड़ना तय है। प्रतिबंधों की जद में आई रिफाइनरियां अब अपनी पेमेंट सिस्टम और सप्लाई चेन में बड़े बदलाव कर सकती हैं, जिससे आने वाले समय में अमेरिकी प्रतिबंधों को जमीन पर लागू करना वाशिंगटन के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकता है।
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