चुनाव आयोग में फैसले कैसे लिए जाते हैं और मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने का क्या नियम है इसे लेकर अब सुप्रीम कोर्ट में चुनाव आयोग ने अपनी बात रखी है। CEC ज्ञानेश कुमार के कामकाज पर उठे सवालों के बीच आयोग ने हलफनामा दाखिल कर कहा है कि मुख्य चुनाव आयुक्त को उसी तरीके से हटाया जा सकता है जिस तरीके से सुप्रीम कोर्ट के किसी जज को हटाया जाता है।
चुनाव आयोग की ओर से दाखिल हलफनामे में कहा गया है कि आयोग के कामकाज में किसी तरह की रुकावट डालना कानून के खिलाफ होगा। यह जवाब उन याचिकाओं के बाद आया है जिनमें मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के काम करने के तरीके पर सवाल उठाए गए हैं। आयोग ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि केवल मीडिया में छपी खबरों को अदालत में सबूत नहीं माना जा सकता।
यह हलफनामा मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और दोनों चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू तथा विवेक जोशी की ओर से संयुक्त रूप से दाखिल किया गया है। आयोग का कहना है कि फैसले किसी एक व्यक्ति की मर्जी से नहीं लिए जाते बल्कि पूरी प्रक्रिया के तहत उन पर विचार किया जाता है। फाइल पहले एक चुनाव आयुक्त के पास जाती है फिर दूसरे चुनाव आयुक्त के पास और उसके बाद मुख्य चुनाव आयुक्त के पास पहुंचती है।
आयोग ने बताया है कि फैसलों को आधिकारिक फाइल में दर्ज किया जाता है और उन पर संबंधित अधिकारियों के हस्ताक्षर होते हैं। इसके बाद आयोग का सचिवालय आदेश जारी करता है और उसे लागू किया जाता है। अगर किसी मुद्दे पर तीनों सदस्यों की राय अलग अलग होती है तो 2023 के कानून की धारा 18 के तहत बहुमत के आधार पर फैसला लिया जा सकता है। आयोग के मुताबिक जहां तक संभव हो फैसले सर्वसम्मति से लेने की कोशिश होती है।
हलफनामे में यह भी बताया गया है कि जरूरी हालात में अगर किसी सदस्य की मौजूदगी संभव नहीं हो तो इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से मंजूरी ली जा सकती है। बाद में इस मंजूरी को आधिकारिक फाइल में दर्ज किया जाता है।
इस मामले में राहुल गांधी समेत विपक्ष के कुछ नेताओं और अन्य याचिकाकर्ताओं ने भी आयोग के कामकाज पर सवाल उठाए हैं। हालांकि चुनाव आयोग ने अपने जवाब में कहा है कि उसके अहम फैसले सामूहिक सहमति से लिए गए हैं। अब इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई और आगे की कार्रवाई पर नजर रहेगी।
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