ऐतिहासिक महाडील: अमेरिका और ईरान के बीच समझौता पक्का, 19 जून को खुलेगा होर्मुज का रास्ता!

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अमेरिका-ईरान समझौते का ऐलान, ट्रंप-ईरान ने किया कंफर्म; फिर खुलेगा होर्मुज, 19 जून को डील पर होंगे हस्ताक्षर

US Iran Peace Deal: दुनिया के सबसे अशांत क्षेत्रों में से एक से आज एक ऐसी खबर आई है जिसने वैश्विक कूटनीति की दिशा बदल दी है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोमवार को आधिकारिक घोषणा की कि अमेरिका और ईरान के बीच बहुप्रतीक्षित शांति समझौता संपन्न हो गया है। इस ऐतिहासिक निर्णय के साथ ही ट्रंप ने सामरिक रूप से संवेदनशील ‘होर्मुज जलडमरूमध्य’ (Strait of Hormuz) को फिर से खोलने और ईरान पर लगी अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी को तत्काल प्रभाव से हटाने का आदेश दिया है। वॉशिंगटन के इस कदम के बाद तेहरान ने भी सकारात्मक संकेत दिए हैं, लेकिन अपनी कुछ शर्तें सामने रखी हैं। ईरान के उप विदेश मंत्री काजेम गरीबाबादी ने स्पष्ट किया कि तेहरान 60 दिनों की प्रस्तावित वार्ता में तभी शामिल होगा, जब अमेरिका युद्ध विराम, नाकेबंदी हटाने और जब्त संपत्तियों को मुक्त करने के अपने वादों पर खरा उतरेगा।

ट्रंप ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘ट्रुथ सोशल’ पर इस कामयाबी का जश्न मनाते हुए लिखा, ‘इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान के साथ समझौता अब पूरा हो चुका है। सभी को बधाई! मैं होर्मुज जलडमरूमध्य को बिना किसी शुल्क के पूरी तरह खोलने और अमेरिकी नौसैनिक नाकेबंदी को तत्काल हटाने का निर्देश देता हूं। दुनिया के जहाज अब अपने इंजन चालू करें, तेल का प्रवाह निर्बाध रूप से जारी रहने दें।’ इस जटिल कूटनीतिक प्रक्रिया को अंजाम तक पहुंचाने में पाकिस्तान की भूमिका भी बेहद अहम मानी जा रही है।

“The Deal with Islamic Republic of Iran is now complete. Congratulations to all!” President Donald J. Trump 🇺🇸 pic.twitter.com/RdSwyEdEtO

— The White House (@WhiteHouse) June 14, 2026

शहबाज शरीफ ने दी शांति की दस्तक, समझौते पर लगी मुहर

पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने भी इस वैश्विक समझौते की पुष्टि करते हुए इसे बड़ी उपलब्धि बताया। उन्होंने साझा किया कि लंबे समय तक चली गहन और जटिल चर्चाओं के बाद दोनों देश अंततः एक सहमति पर पहुंचे हैं। इस समझौते की सबसे बड़ी बात यह है कि दोनों पक्षों ने लेबनान सहित सभी मोर्चों पर सैन्य अभियानों को तत्काल और स्थायी रूप से रोकने का निर्णय लिया है।

शरीफ ने ‘एक्स’ (X) पर अपनी पोस्ट में लिखा, ‘हफ्तों की सघन बातचीत के बाद हमें यह बताते हुए बेहद खुशी हो रही है कि संयुक्त राज्य अमेरिका और ईरान के बीच शांति समझौता हो गया है। दोनों पक्षों ने सभी मोर्चों पर सैन्य गतिविधियों को हमेशा के लिए समाप्त करने का संकल्प लिया है।’ उन्होंने यह भी जानकारी साझा की कि इस ऐतिहासिक संधि पर 19 जून को स्विट्जरलैंड की धरती पर आधिकारिक हस्ताक्षर किए जाएंगे।

शहबाज शरीफ ने वार्ता को सफल बनाने के लिए अमेरिका और ईरान के धैर्य की सराहना की। उन्होंने इस मध्यस्थता में कतर के नेतृत्व के प्रति आभार जताया और सऊदी अरब एवं तुर्किये के महत्वपूर्ण योगदान को भी रेखांकित किया, जिनके सहयोग से यह कूटनीतिक जीत मुमकिन हो सकी है।

Following intensive talks, we are pleased to announce that the Peace Deal between the United States of America and Islamic Republic of Iran has been REACHED. Both sides have declared the immediate and permanent termination of military operations on all fronts, including in…

— Shehbaz Sharif (@CMShehbaz) June 14, 2026

स्विट्जरलैंड में शुक्रवार को जुटेगा विश्व, होगा औपचारिक हस्ताक्षर

ईरान के सरकारी मीडिया ‘प्रेस टीवी’ के अनुसार, काजेम गरीबाबादी ने पुष्टि की है कि शुक्रवार को समझौते पर अंतिम मुहर लग जाएगी, जिसके बाद ‘मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग’ (MoU) का पूरा मसौदा दुनिया के सामने रखा जाएगा। गरीबाबादी ने इसे ईरान की जीत बताते हुए कहा कि जिस दुश्मन ने नापाक इरादों के साथ हमला किया था, वह अपने लक्ष्यों में नाकाम रहा है।

ईरानी उप विदेश मंत्री ने भावुक होते हुए कहा, ‘यह सफलता केवल मेज पर हुई कूटनीति नहीं है, बल्कि यह हमारी सेना के शौर्य और शहीदों के बलिदान का परिणाम है। शुक्रवार को दोनों देशों के प्रतिनिधिमंडल भविष्य की रूपरेखा पर चर्चा करेंगे और हस्ताक्षर के बाद दस्तावेजों को सार्वजनिक कर दिया जाएगा।’

ईरान की दो-टूक: ‘भरोसा नहीं, पहले कार्रवाई देखेगा तेहरान’

भले ही शांति की ओर कदम बढ़ गए हों, लेकिन ईरान अभी भी सतर्क है। गरीबाबादी ने स्पष्ट लहजे में कहा कि अगले चरण की 60 दिवसीय वार्ता में शामिल होना इस बात पर निर्भर करेगा कि अमेरिका अपने वादे कितनी जल्दी निभाता है। उन्होंने कहा कि हम सबसे पहले इस बात की पुष्टि करेंगे कि युद्ध वास्तव में समाप्त हुआ है, नाकेबंदी पूरी तरह हट गई है और हमारी संपत्तियां हमें वापस मिल गई हैं।

रणनीतिक हितों से कोई समझौता नहीं

समझौते की प्रकृति पर बात करते हुए गरीबाबादी ने ‘अल जजीरा’ से कहा कि ईरान ने मसौदा तैयार करते समय अपने रणनीतिक हितों को सर्वोपरि रखा है। उन्होंने चेतावनी भरे अंदाज में कहा, ‘इस समझौते का मतलब यह कतई नहीं है कि हमें दुश्मन पर अंधा भरोसा है। हम अमेरिका की हर गतिविधि और वादों के क्रियान्वयन पर पैनी नजर बनाए रखेंगे।’

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कतर, सऊदी और तुर्किये: पर्दे के पीछे के असली नायक

इस शांति प्रक्रिया में मध्यस्थ देशों की भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। शहबाज शरीफ ने विशेष रूप से कतर, सऊदी अरब और तुर्किये का धन्यवाद किया। रविवार को कतर के एक उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल के तेहरान दौरे के बाद ही इस शांति समझौते की तस्वीर साफ हुई थी। अब आधिकारिक हस्ताक्षर से पहले कई तकनीकी बैठकें होंगी ताकि समझौते को जमीन पर उतारने का ढांचा तैयार किया जा सके।

तनाव के साये में हुई डील, ट्रंप ने नेतन्याहू को घेरा

समझौते की घोषणा से ठीक पहले लेबनान में बढ़े तनाव ने धड़कनें बढ़ा दी थीं। डोनाल्ड ट्रंप ने स्वीकार किया कि बेरूत में इजरायली हमलों के कारण समझौते की प्रक्रिया में कुछ घंटों की देरी हुई। ट्रंप ने ‘एक्सियोस’ से बातचीत में इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की तीखी आलोचना की। उन्होंने कहा कि वह इजरायली कार्रवाई के समय से काफी नाराज थे क्योंकि इससे महीनों की कूटनीतिक मेहनत पर पानी फिरने का खतरा पैदा हो गया था।

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परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय सुरक्षा का नया ढांचा

डोनाल्ड ट्रंप का मानना है कि यह समझौता मध्य पूर्व (पश्चिम एशिया) में स्थिरता लाएगा। इस डील के जरिए ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर पहले से अधिक सख्त और प्रभावी निगरानी तंत्र स्थापित किया जाएगा। ट्रंप ने भरोसा दिलाया कि नई निरीक्षण व्यवस्था के तहत ईरान के परमाणु सामग्री प्रबंधन पर कड़ी नजर रखी जाएगी ताकि भविष्य में परमाणु हथियारों के खतरे को पूरी तरह समाप्त किया जा सके।

खामेनेई की मौत से उपजा संघर्ष अब अंत की ओर

यह ऐतिहासिक समझौता उस भीषण संघर्ष का पटाक्षेप हो सकता है जो 28 फरवरी को शुरू हुआ था। उस समय अमेरिका और इजरायल के संयुक्त हमलों में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत हो गई थी, जिससे पूरा क्षेत्र युद्ध की कगार पर खड़ा हो गया था। यदि 19 जून को स्विट्जरलैंड में सब कुछ योजना के अनुसार रहा, तो इसे आधुनिक इतिहास की सबसे बड़ी कूटनीतिक जीत माना जाएगा।

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