इंटरनेट की ‘नब्ज’ पर ईरान का वार! क्या समंदर के नीचे बिछी तारें कटने से थम जाएगी आपकी डिजिटल दुनिया?

जरा कल्पना कीजिए… अचानक आपके मोबाइल का इंटरनेट गायब हो जाए, ऑनलाइन पेमेंट फेल होने लगें और पूरी दुनिया से आपका संपर्क टूट जाए। क्या ऐसा वाकई मुमकिन है? यह सवाल आज इसलिए सुर्खियां बटोर रहा है क्योंकि ईरान ने अमेरिका और इजरायल के साथ बढ़ते तनाव के बीच ‘डिजिटल ब्लैकआउट’ की धमकी दी है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, ईरान ने चेतावनी दी है कि यदि युद्ध छिड़ा, तो वह ‘पर्सियन गल्फ’ (Persian Gulf) की गहराइयों में बिछी उन इंटरनेट केबल्स को काट सकता है जो दुनिया को जोड़ती हैं। ईरान न केवल इन्हें नुकसान पहुंचाने बल्कि इनकी मरम्मत में भी अड़ंगा डालने की योजना बना रहा है।
ट्रंप की चेतावनी और ईरान की ‘केबल’ रणनीति
इस तनाव की जड़ें फरवरी 2026 के सैन्य टकराव में छिपी हैं, जब अमेरिका और इजरायल ने ईरान पर हमले किए थे। अब जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दोबारा हमले की चेतावनी दी है, तो ईरान ने एक नया पैंतरा चला है। ईरान का कहना है कि वह सिर्फ सैन्य ठिकानों पर पलटवार नहीं करेगा, बल्कि समुद्र के नीचे बिछी उन केबल्स और डिजिटल बुनियादी ढांचे को भी निशाना बनाएगा जिनसे अमेरिका और उसके सहयोगी देशों का हित जुड़ा है।
मिडल ईस्ट इंस्टीट्यूट के विशेषज्ञ एलेक्स वतंका का मानना है कि ईरान का यह कदम सीधे तौर पर खाड़ी देशों और अमेरिकी कंपनियों पर दबाव बनाने की रणनीति है। खाड़ी देशों में डेटा सेंटर्स और डिजिटल सेवाओं में भारी निवेश करने वाली कंपनियां अब चिंतित हैं। तेहरान चाहता है कि ये कंपनियां ट्रंप प्रशासन को सैन्य कार्रवाई के जोखिमों के प्रति आगाह करें।
समंदर के नीचे का जादुई जाल: आखिर ये केबल्स काम कैसे करती हैं?
इंटरनेट की इस दुनिया को समझने के लिए हमें यह जानना होगा कि जब हम वॉट्सऐप पर एक ‘Hi’ भेजते हैं, तो वह सफर कैसे करता है। शहर के भीतर तो डेटा मोबाइल टावरों या फाइबर से चला जाता है, लेकिन सात समंदर पार जाने के लिए आज भी हम पानी के नीचे बिछी केबल्स पर निर्भर हैं।
ये कोई मामूली तार नहीं होते। ये कांच के बेहद महीन ‘ऑप्टिकल फाइबर’ से बने होते हैं। इसमें आपका डेटा बिजली की तरह नहीं, बल्कि रोशनी की छोटी-छोटी किरणों के रूप में दौड़ता है। जैसे ही आप कोई मैसेज भेजते हैं, वह डिजिटल सिग्नल रोशनी में बदल जाता है और हजारों किलोमीटर का सफर तय कर दूसरी तरफ फिर से डेटा में बदल जाता है। यह सब पलक झपकते ही हो जाता है।
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सैटेलाइट के दौर में भी केबल्स ही क्यों हैं ‘किंग’?
अक्सर लोग सोचते हैं कि आज के दौर में इंटरनेट सैटेलाइट से चलता है। सच तो यह है कि दुनिया का 99 प्रतिशत से ज्यादा डेटा ट्रैफिक आज भी इन्हीं समुद्री केबल्स के जरिए गुजरता है। इंटरनेशनल टेलीकम्युनिकेशन यूनियन (ITU) के मुताबिक, सैटेलाइट के मुकाबले ये केबल्स कहीं ज्यादा तेज और बड़ी मात्रा में डेटा ले जाने में सक्षम हैं। जब आप कोई विदेशी वेबसाइट खोलते हैं या ऑनलाइन गेम खेलते हैं, तो आपका डेटा इन्हीं केबल्स के रास्ते दुनिया के दूसरे कोने तक पहुंचता है।
ईरान की धमकी से आखिर दुनिया क्यों कांप रही है?
ईरान की धमकी ने वैश्विक चिंता इसलिए बढ़ा दी है क्योंकि ‘पर्सियन गल्फ’ और ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ का इलाका न केवल तेल, बल्कि अब डिजिटल सप्लाई के लिए भी संवेदनशील हो गया है। हालांकि, राहत की बात यह है कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज से गुजरने वाली केबल्स वैश्विक इंटरनेट क्षमता का 1 प्रतिशत से भी कम हिस्सा संभालती हैं। यानी, इन केबल्स के कटने से पूरी दुनिया का इंटरनेट पूरी तरह ठप तो नहीं होगा, लेकिन इसके परिणाम काफी गंभीर हो सकते हैं।
केबल कटी तो क्या होगा? ‘डिजिटल ट्रैफिक जाम’ का खतरा
इसे एक आसान उदाहरण से समझें। अगर शहर में आने वाली पांच मुख्य सड़कों में से एक बंद हो जाए, तो बाकी चार सड़कों पर गाड़ियों का दबाव बढ़ जाएगा। इंटरनेट के साथ भी यही होता है। जब एक केबल कटती है, तो डेटा को दूसरे रास्तों (री-रूटिंग) पर भेजा जाता है। यदि कई केबल्स एक साथ कट गईं, तो बाकी केबल्स पर बोझ इतना बढ़ जाएगा कि इंटरनेट की रफ्तार चींटी की चाल जैसी हो जाएगी। कुछ वेबसाइट्स खुलना बंद हो जाएंगी और वीडियो कॉल में रुकावटें आने लगेंगी।
क्या भारत पर भी पड़ेगा इसका असर?
भारत का इंटरनेट सिस्टम कई अलग-अलग अंतरराष्ट्रीय रूट्स से जुड़ा है, इसलिए ईरान की धमकी से पूरा देश ‘ऑफलाइन’ नहीं होगा। लेकिन, कुछ खास सेवाओं पर असर जरूर पड़ सकता है। विदेशी सर्वर पर चलने वाले सॉफ्टवेयर धीमे हो सकते हैं, अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक लेन-देन में देरी हो सकती है और ऑनलाइन गेमिंग या वीडियो कॉल्स में ‘लैग’ (रुकावट) देखने को मिल सकता है।
मरम्मत की चुनौती: समंदर में सुई ढूंढने जैसा काम
घर का ब्रॉडबैंड ठीक करना आसान है, लेकिन समंदर की गहराई में टूटी केबल को जोड़ना किसी चुनौती से कम नहीं। इसके लिए विशेष जहाजों और रोबोटिक उपकरणों की जरूरत होती है। युद्ध की स्थिति में यह काम और भी खतरनाक हो जाता है। अगर ईरान मरम्मत करने वाले जहाजों को रोक देता है, तो इंटरनेट की यह समस्या हफ्तों या महीनों तक खिंच सकती है।
विशेषज्ञों की राय: कितना वास्तविक है खतरा?
रिसर्च डायरेक्टर एलन मौल्डिन के अनुसार, तकनीकी रूप से पूरी दुनिया का इंटरनेट बंद होना नामुमकिन है, लेकिन क्षेत्रीय स्तर पर यह बड़ी मुसीबत बन सकता है। खतरा केवल केबल कटने का नहीं, बल्कि उसे ठीक करने में होने वाली जानबूझकर की गई देरी का है। ईरान का यह नया ‘साइबर-फिजिकल’ युद्ध का तरीका दुनिया के लिए एक बड़ी चेतावनी है।
निष्कर्ष:
आज हम जिस इंटरनेट को अपनी उंगलियों पर नचाते हैं, उसकी डोर वास्तव में उन गुमनाम केबल्स के हाथ में है जो समंदर की खामोश गहराइयों में बिछी हैं। ईरान की धमकी ने यह साबित कर दिया है कि भविष्य के युद्ध केवल सीमाओं पर नहीं, बल्कि उन अदृश्य तारों पर भी लड़े जाएंगे जो हमारी आधुनिक जिंदगी की धड़कन हैं।
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