जामिया में 18 साल से चुनावी सन्नाटा, फिर मोदी सरकार को घेरने की सियासत क्यों?

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जामिया में 2006 से नहीं हुए छात्रसंघ चुनाव, फिर सवाल मोदी सरकार से क्यों?

जामिया मिल्लिया इस्लामिया: 20 साल का चुनावी ‘सूखा’ और छात्रों का ‘सत्याग्रह’ – क्या फिर बहाल होगा लोकतंत्र?

31 मार्च 2006 को जामिया मिल्लिया इस्लामिया में छात्र राजनीति के एक अध्याय पर विराम लग गया था। कैंपस में बढ़ती हिंसा का हवाला देते हुए प्रशासन ने छात्रसंघ को भंग कर दिया था। उस बात को आज पूरे दो दशक बीत चुके हैं, लेकिन कैंपस में चुनावी हलचल अब तक नहीं लौटी। अब, अक्टूबर 2026 से छात्रसंघ बहाली की गूंज फिर सुनाई दे रही है। छात्र अपनी मांग को लेकर भूख हड़ताल पर हैं और 29 अक्टूबर को उनके संघर्ष का 17वां दिन है। जहां विश्वविद्यालय प्रशासन खुद को चुनाव का समर्थक बताते हुए तैयारी के लिए समय मांग रहा है, वहीं छात्र इसे महज एक ‘टालने की रणनीति’ और सरकारी दबाव का परिणाम मान रहे हैं।

2005 का वो हमला और छात्रसंघ पर लगा ‘ताला’

जामिया में आखिरी बार छात्रसंघ चुनाव साल 2005 में हुए थे, लेकिन महज एक साल बाद ही 31 मार्च 2006 को इसे भंग कर दिया गया। तत्कालीन कुलपति प्रोफेसर मुशीरुल हसन पर हुए हमले और कैंपस में मचे बवाल को प्रशासन ने इसकी मुख्य वजह बताया था। हालांकि, उस दौर के छात्र नेताओं की कहानी कुछ और ही है। तत्कालीन छात्रसंघ का आरोप है कि उस वक्त के प्रॉक्टर रॉकेट इब्राहिम, उनके बेटे और साथियों ने छात्रसंघ अध्यक्ष शम्स परवेज और अन्य छात्रों पर हमला किया था। इस हिंसक झड़प में शम्स परवेज गंभीर रूप से घायल हुए, जिसके बाद कैंपस में आक्रोश भड़का और अंततः यूनिवर्सिटी को बंद कर छात्रसंघ खत्म कर दिया गया।

20 साल बाद अचानक चुनाव की मांग क्यों? प्रशासन का पक्ष

जामिया प्रशासन का सवाल है कि यदि छात्रसंघ इतना ही जरूरी था, तो पिछले 20 सालों में यह मांग क्यों नहीं उठी? यूनिवर्सिटी के आधिकारिक बयान के अनुसार, वर्तमान वीसी से पहले कई अन्य कुलपति आए और गए, लेकिन चुनाव की बात अब अक्टूबर में ही क्यों शुरू हुई? प्रशासन का कहना है कि वे चुनाव कराने के लिए तैयार हैं, लेकिन 22 हजार छात्रों के साथ यह प्रक्रिया रातों-रात पूरी नहीं हो सकती। इसके लिए नया संविधान बनाना, वोटर लिस्ट तैयार करना और नियमों का पालन करना अनिवार्य है।

प्रशासन का कहना है, “जब आपने 20 साल इंतजार किया, तो दो महीने और सही। हमने चुनाव के लिए 7 सदस्यीय टीम बनाई है, लेकिन छात्र हिंसा और नारेबाजी का रास्ता चुन रहे हैं। यह एक केंद्रीय विश्वविद्यालय है जो नियम-कायदों और कोर्ट के आदेशों से चलता है। हम अपनी बातों से मुकर नहीं सकते।” साथ ही, प्रशासन ने किसी भी तरह के सरकारी दबाव या छात्रों पर एफआईआर दर्ज कराने की बात से साफ इनकार किया है।

“मुस्लिम लीडरशिप को दबाने की साजिश”: छात्रों के गंभीर आरोप

दूसरी ओर, छात्रों के तर्क बेहद तीखे हैं। छात्र आमिर हैदर खान का आरोप है कि जामिया मुसलमानों की सांस्कृतिक विरासत है और यहां से निकलने वाले छात्र नेता देश की राजनीति में बड़ा मुकाम हासिल कर सकते हैं। वे कहते हैं, “सरकारें नहीं चाहतीं कि एक मजबूत ‘मुस्लिम लीडरशिप’ तैयार हो, इसीलिए छात्रसंघ चुनाव टाले जा रहे हैं।” आमिर के मुताबिक, यह केवल वर्तमान सरकार की बात नहीं है, कांग्रेस के दौर में भी यही रवैया रहा। वे कहते हैं कि छात्रों की बुनियादी समस्याओं (पानी, खाना) की सुनवाई के लिए छात्रसंघ का बजट तो आता है, पर संघ नहीं है।

यूनिवर्सिटी की पूर्व छात्रा कामिनी झा का मानना है कि यह केवल जामिया का मामला नहीं, बल्कि पूरे देश के विश्वविद्यालयों में छात्र राजनीति को खत्म करने की एक व्यापक सोच है। वे कहती हैं, “सरकार विरोधी विचारधारा को सुनना ही नहीं चाहती। 2019 में पुलिस ने जिस तरह लाइब्रेरी में दमन किया, वह इसका प्रमाण है।”

छात्रसंघ की अनुपस्थिति: कितना बड़ा नुकसान?

फिलहाल जामिया में छात्रसंघ की जगह ‘सब्जेक्ट एसोसिएशन’ काम कर रहा है, जिसमें प्रत्येक विभाग से तीन सदस्य होते हैं। प्रशासन का तर्क है कि ये एसोसिएशन छात्रों की समस्याओं को बखूबी सुलझा रहे हैं और छात्रसंघ नेता शायद आम छात्रों की पहुंच से दूर हो जाएं। प्रशासन को यह भी डर है कि विरोध प्रदर्शनों के कारण कक्षाएं ऑनलाइन चलानी पड़ रही हैं, जिससे छात्रों का सेमेस्टर खराब हो सकता है।

वहीं, आंदोलनकारी छात्रों का कहना है कि प्रशासन और प्रोफेसर उन्हें धमकाते हैं और मार्क्स काटने का डर दिखाते हैं। उनके अनुसार, एक लोकतांत्रिक मंच के बिना उनकी छोटी-मोटी शिकायतों की भी कोई सुनवाई नहीं होती। अब सवाल यह है कि क्या जामिया का यह 20 साल का लंबा इंतजार खत्म होगा, या प्रशासन और छात्रों के बीच की यह जंग और लंबी खिंचेगी?


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