
लैंड फॉर जॉब स्कैम: जमीन के बदले नौकरी देने के चर्चित घोटाले में राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव की उम्मीदों पर सुप्रीम कोर्ट ने पानी फेर दिया है। अदालत ने लालू यादव की उस याचिका को सिरे से खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने अपने और अपने परिवार के खिलाफ दर्ज FIR को रद्द करने की गुहार लगाई थी। इस कड़े फैसले के बाद लालू परिवार पर कानूनी शिकंजा और भी ज्यादा कसता नजर आ रहा है, हालांकि इस कानूनी झटके के बीच सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें एक छोटी सी मानवीय राहत भी दी है।
क्या एक ‘क्रिमिनल एंटरप्राइज’ की तरह हुआ काम?
जस्टिस एमएम सुंदरेश और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की बेंच ने याचिका पर सुनवाई करते हुए स्पष्ट रुख अपनाया कि इस गंभीर मामले में FIR को रद्द नहीं किया जा सकता। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट पहले ही लालू यादव समेत 41 आरोपियों के खिलाफ आरोप तय कर चुकी है। अदालत के इस रुख से साफ है कि अब लालू परिवार को लंबी कानूनी लड़ाई और ट्रायल का सामना करना होगा। गौर करने वाली बात यह है कि निचली अदालत ने अपनी टिप्पणी में इस पूरे घोटाले को किसी ‘क्रिमिनल एंटरप्राइज’ की तरह सुनियोजित करार दिया था।
The Supreme Court has refused relief to RJD leader Lalu Prasad Yadav seeking to quash proceedings linked to an FIR registered against him and several of his family members in connection with the land-for-jobs case.
The bench of Justices M.M. Sundresh and N. Kotiswar Singh,… pic.twitter.com/55usMV6OAY
— ANI (@ANI) April 13, 2026
कोर्ट में पेशी से मिली बड़ी रियायत
भले ही FIR रद्द करने की मुख्य मांग ठुकरा दी गई हो, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने लालू यादव की खराब सेहत और ढलती उम्र को ध्यान में रखते हुए उन्हें एक विशेष रियायत प्रदान की है। बेंच ने आदेश दिया है कि नियमित सुनवाई के दौरान लालू प्रसाद यादव को निचली अदालत में व्यक्तिगत रूप से पेश होने की आवश्यकता नहीं होगी। उनके वकील उनकी ओर से कोर्ट में पक्ष रख सकेंगे। इस आदेश से उन्हें बार-बार अदालत के चक्कर लगाने से तो मुक्ति मिल गई है, लेकिन केस की मेरिट के आधार पर उन्हें अपनी बेगुनाही साबित करने की चुनौती अब भी बरकरार है।
क्या है जमीन के बदले नौकरी का यह ‘खेल’?
यह पूरा मामला उस दौर का है जब लालू प्रसाद यादव केंद्र सरकार में रेल मंत्री की कुर्सी संभाल रहे थे। आरोप है कि उस दौरान रेलवे में ग्रुप-डी के पदों पर नियुक्तियां करने के बदले में उम्मीदवारों और उनके परिजनों से बेहद मामूली कीमतों पर जमीनें अपने नाम लिखवाई गईं। केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) का दावा है कि ये कीमती जमीनें सीधे लालू यादव के परिवार के सदस्यों और उनके मालिकाना हक वाली कंपनियों के नाम पर ट्रांसफर की गई थीं। अब जब सुप्रीम कोर्ट ने जांच और कानूनी प्रक्रिया को हरी झंडी दे दी है, तो आने वाले दिनों में बिहार के सियासी गलियारों में इस मुद्दे पर घमासान तेज होना तय है।
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