पाकिस्तानी सेना: अपने ही ‘भस्मासुर’ से उलझी, रिपोर्ट का खुलासा
पाकिस्तान की सेना, जो एक समय देश की वैचारिक ढाल मानी जाती थी, आज उन्हीं कट्टरपंथी इस्लामी समूहों से जूझ रही है, जिन्हें उसने अपने फायदे के लिए पाला-पोसा और अब वे ‘भस्मासुर’ बनकर उभर रहे हैं। एक चौंकाने वाली रिपोर्ट में यह हकीकत सामने आई है।
रिपोर्ट के अनुसार, पाकिस्तान की सैन्य रणनीति में एक बड़ा विरोधाभास देखने को मिल रहा है। एक ओर, सेना के जनरल पश्चिम को उग्रवाद पर नियंत्रण रखने का पाठ पढ़ा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर, वे अपने ही देश में लोकतांत्रिक आवाजों को दबाने के लिए धार्मिक राष्ट्रवाद का सहारा ले रहे हैं।
‘ग्रीक सिटी टाइम्स’ द्वारा प्रकाशित एक रिपोर्ट बताती है कि, “तहरीक-ए-लब्बैक पाकिस्तान (टीएलपी) और अन्य इस्लामी समूहों द्वारा हाल ही में किए गए हिंसक प्रदर्शन इस बात का प्रमाण हैं कि देश किस हद तक अपने पश्चिमी-समर्थक शासकों और धार्मिक उन्माद से प्रेरित जन आंदोलनों के बीच बंट चुका है। फील्ड मार्शल असीम मुनीर के नेतृत्व वाला पाकिस्तानी सैन्य प्रतिष्ठान, वाशिंगटन के साथ संबंधों को सुधारने और इजरायल-गाजा शांति प्रक्रिया का मौन समर्थन करने की कोशिश में, अपने ही वैचारिक सहयोगियों, यानी दक्षिणपंथी इस्लामी गुटों का विश्वास जीतने में नाकाम रहा है। इसका नतीजा घातक अशांति, बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां और सड़कों पर खुला विद्रोह है।”
रिपोर्ट में आगे बताया गया है, “सबसे हालिया विरोध प्रदर्शन सितंबर के अंत और अक्टूबर 2025 की शुरुआत में भड़के, जब टीएलपी के कार्यकर्ताओं की लाहौर, कराची और रावलपिंडी में पुलिस के साथ हिंसक झड़पें हुईं। यह खबर तब सामने आई जब इस्लामाबाद ने इजरायल-गाजा स्थिति को सामान्य बनाने के उद्देश्य से पश्चिम-समर्थित वार्ताओं का चुपचाप समर्थन करने पर सहमति जताई थी।”
रिपोर्ट इस बात पर जोर देती है कि, हजारों टीएलपी समर्थक पाकिस्तान के शहरों में सड़कों पर उतर आए, सेना के खिलाफ नारेबाजी की और जनरलों पर “डॉलर के लिए इस्लाम बेचने” का गंभीर आरोप लगाया।
रिपोर्ट के अनुसार, ये विरोध प्रदर्शन हिंसक रूप ले चुके थे। पुलिस को भीड़ को नियंत्रित करने के लिए आंसू गैस, रबर की गोलियों और गोलियों का सहारा लेना पड़ा। मानवाधिकार संगठनों और स्थानीय मीडिया रिपोर्टों का हवाला देते हुए, रिपोर्ट में कहा गया है कि कई लोगों की जान चली गई और दर्जनों घायल हुए, जिनमें कई युवा टीएलपी कार्यकर्ता शामिल थे।
“इस गुस्से की जड़ यह धारणा है कि पाकिस्तान के सैन्य प्रतिष्ठान ने स्वार्थ के लिए अपनी वैचारिक प्रतिबद्धताओं को ताक पर रख दिया है,” रिपोर्ट में कहा गया है। “वही सेना, जो कभी टीएलपी और अन्य बरेलवी या देवबंदी संगठनों जैसे इस्लामी आंदोलनों का इस्तेमाल धार्मिक मुद्दों पर समर्थन जुटाने के लिए करती थी, अब उन्हें दुश्मन मानने लगी है, जब वे उसकी नीतिगत दिशा को चुनौती देते हैं।”
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