ट्रंप का ‘हॉर्मुज चक्रव्यूह’: ईरान की पूर्ण घेराबंदी और चीन पर सीधा प्रहार, क्या महायुद्ध की आहट है?
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने वैश्विक भू-राजनीति की बिसात पर एक ऐसा दांव चला है जिसने पूरी दुनिया को चौंका दिया है। हॉर्मुज जलडमरूमध्य, जो वैश्विक व्यापार की जीवनरेखा माना जाता है, अब अमेरिकी नौसेना की सख्त घेराबंदी की चपेट में है। राष्ट्रपति ट्रंप के निर्देशानुसार, सोमवार सुबह 10 बजे (भारतीय समयानुसार शाम 7:30 बजे) से इस रणनीतिक मार्ग की आधिकारिक नाकेबंदी शुरू हो गई है। अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने दोटूक शब्दों में स्पष्ट किया है कि यह पाबंदी विशेष रूप से उन जहाजों पर लागू होगी जो ईरानी बंदरगाहों की ओर जा रहे हैं या वहां से निकल रहे हैं। हालांकि, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई), कतर और सऊदी अरब जैसे अमेरिकी मित्र देशों के व्यापारिक जहाजों को इस घेराबंदी से छूट दी गई है; उनके लिए यह मार्ग पहले की तरह सुरक्षित रहेगा। सेना ने कड़ी चेतावनी दी है कि ईरानी तटों की ओर रुख करने वाले हर जहाज को रोका जाएगा, चाहे वह किसी भी देश का क्यों न हो।
हॉर्मुज जलडमरूमध्य की अहमियत इसी बात से समझी जा सकती है कि दुनिया की कुल तेल आपूर्ति का एक-तिहाई हिस्सा इसी संकरे मार्ग से होकर गुजरता है। ट्रंप का यह फैसला ईरान और अमेरिका के बीच जारी दशकों पुराने तनाव को एक ऐसे मोड़ पर ले आया है, जहां से वापसी का रास्ता खतरनाक नजर आता है। अमेरिकी सेना भले ही गैर-ईरानी जहाजों को निर्बाध आवाजाही की अनुमति दे रही है, लेकिन ईरानी समुद्री सीमा की ओर जाने वाले हर जहाज को अब सघन जांच और कड़े प्रतिबंधों का सामना करना होगा। जानकारों का मानना है कि यह नौसैनिक नाकेबंदी न केवल ईरान को आर्थिक रूप से पंगु बनाने की कोशिश है, बल्कि यह चीन के खिलाफ एक प्रत्यक्ष युद्ध की घोषणा के समान है। चीन, ईरानी कच्चे तेल का सबसे बड़ा खरीदार है और उस गुप्त व्यापार का मुख्य केंद्र है जिसे ट्रंप प्रशासन अब जड़ से उखाड़ना चाहता है। ट्रंप का मानना है कि तेल से मिलने वाला राजस्व ही ईरान की ताकत है, और इसे रोकना ही उसे झुकाने का एकमात्र तरीका है।
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अंतर्राष्ट्रीय कानूनों और विशेषज्ञों के नजरिए से देखें तो किसी भी देश की समुद्री नाकेबंदी को ‘युद्ध का कार्य’ (Act of War) माना जाता है। जब कोई देश दूसरे देश के बंदरगाहों पर बल प्रयोग के जरिए जहाजों की आवाजाही रोकता है, तो इसे सैन्य संघर्ष की शुरुआत माना जाता है। इतिहास गवाह है कि क्यूबा मिसाइल संकट के दौरान वाशिंगटन ने सोवियत संघ के साथ सीधे युद्ध से बचने के लिए ‘नाकेबंदी’ की जगह ‘क्वारंटाइन’ शब्द का इस्तेमाल किया था। लेकिन ट्रंप प्रशासन ने ऐसी कूटनीतिक औपचारिकताओं को दरकिनार करते हुए सीधे तौर पर चीन और ईरान को निशाने पर लिया है, जो अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में एक बड़ा बदलाव है।
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इस संकट ने चीन की रातों की नींद उड़ा दी है, क्योंकि बीजिंग अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए ईरान पर अत्यधिक निर्भर है। आंकड़ों के मुताबिक, ईरान के कुल तेल निर्यात का 90 प्रतिशत से ज्यादा हिस्सा अकेले चीन जाता है। बीजिंग हर दिन करीब 1.5 से 1.6 मिलियन बैरल तेल आयात करता है, जो उसके कुल कच्चे तेल के आयात का लगभग 15-16 प्रतिशत है। यह पूरा व्यापार प्रतिबंधों से बचने के लिए बनाए गए एक जटिल और गुप्त नेटवर्क के जरिए संचालित होता है। ट्रंप की इस नाकेबंदी ने अब चीन की ऊर्जा सुरक्षा पर सीधा प्रहार किया है, जिससे आने वाले दिनों में वैश्विक बाजार और कूटनीति में भारी उथल-पुथल मचनी तय है।
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