अमेरिका की ‘आर्थिक दबंगई’ को भारत के बाद अब दक्षिण अफ्रीका का भी करारा जवाब!
वैश्विक मंच पर अमेरिका की ‘टैरिफ डिप्लोमेसी’ अब अपनी चमक खोती दिख रही है। जिस आर्थिक दबाव की रणनीति से वह अन्य देशों को झुकाने की कोशिश कर रहा था, वह अब कमजोर पड़ती जा रही है। इस वैश्विक चुनौती का सबसे पहले भारत ने मजबूती से सामना किया और सफलतापूर्वक अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा की। अब इसी राह पर चलते हुए दक्षिण अफ्रीका ने भी अमेरिका को दो टूक जवाब दिया है। दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति सिरिल रामाफोसा ने अमेरिका के साथ व्यापार वार्ताओं को लेकर एक बेहद कड़ा और स्पष्ट बयान जारी किया है। उन्होंने सीधे शब्दों में अमेरिका को चेतावनी दी है कि अफ्रीकी महाद्वीप को धमकाया नहीं जा सकता। रामाफोसा ने दोहराया कि उनका देश अमेरिका को लगातार अधिक से अधिक उत्पाद निर्यात करने का इच्छुक है, साथ ही दोनों देशों की कंपनियों के बीच परस्पर निवेश को बढ़ावा देना चाहता है।
रामाफोसा ने अपनी बातचीत की मजबूत स्थिति का खुलासा करते हुए कहा कि दक्षिण अफ्रीका की असली ताकत उसके भीतर समाए प्राकृतिक संसाधनों और विशेष खनिजों से आती है – वे खनिज जिनकी अमेरिका को आज भारी आवश्यकता है। उन्होंने गर्व से बताया कि उनके पास न केवल ये बहुमूल्य खनिज हैं, बल्कि उन्हें परिष्कृत करने की विशेषज्ञ क्षमता भी मौजूद है। इसके अतिरिक्त, दक्षिण अफ्रीका एक ऐसी उन्नत ऊर्जा सुविधा से भी संपन्न है जो दुनिया के कई देशों के पास नहीं है। यही अद्वितीय सामर्थ्य हमारी वार्ताओं में हमारी आधारशिला बनती है।
राष्ट्रपति रामाफोसा ने अपनी संवाद रणनीति का भी बेबाकी से वर्णन किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि दक्षिण अफ्रीका ने बातचीत का एक सीधा और सम्मानजनक मार्ग चुना है। ‘हम अमेरिका से न तो डरते हैं और न ही कभी उसके सामने घुटने टेके हैं,’ उन्होंने दृढ़ता से कहा। ‘हमने स्पष्ट संदेश दे दिया है कि हमें धमकाया नहीं जा सकता।’
रामाफोसा ने अपनी बात पर जोर देते हुए कहा कि दक्षिण अफ्रीका एक संप्रभु राष्ट्र है और वह अपनी शर्तों पर ही वार्ता करेगा, ताकि देश के लिए सर्वोत्तम संभव समझौता सुनिश्चित किया जा सके। उनका यह मुखर बयान तत्कालीन अमेरिकी प्रशासन, विशेषकर डोनाल्ड ट्रंप के लिए एक बड़ा राजनयिक झटका माना जा रहा है। दक्षिण अफ्रीकी राष्ट्रपति ने वाशिंगटन को यह स्पष्ट संदेश भेज दिया है कि न तो उनका देश अमेरिका से भयभीत है और न ही उसे किसी प्रकार से डराया जा सकता है। यह उल्लेखनीय है कि ट्रंप लगातार टैरिफ के हथियार से अन्य देशों पर दबाव बनाने का प्रयास कर रहे थे, लेकिन उनकी यह आक्रामक नीति वैश्विक स्तर पर कहीं भी सफल नहीं हो पा रही थी। भारत ने भी अमेरिका द्वारा लगाए गए 50 प्रतिशत के भारी टैरिफ का दृढ़ता से सामना किया था और अपने अडिग रुख को स्पष्ट रूप से बरकरार रखा था।
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