खार्ग द्वीप की पहचान सिर्फ आधुनिक तेल उद्योग की धमनियों तक सिमटी नहीं है। पुरातात्विक साक्ष्य बताते हैं कि इसके सीने में हजारों साल पुरानी मानवीय हलचलों के निशान दबे हैं। प्राचीन फारसी साम्राज्यों के दौर में यह समुद्री व्यापार का एक जीवंत पड़ाव था, जिसकी गवाही यहाँ की चट्टानों में तराशे गए मकबरे और शुरुआती ईसाई मठों के अवशेष आज भी देते हैं। मध्यकाल की लहरों पर सवार होकर यह द्वीप फारस, भारत और बसरा के बीच व्यापारिक रिश्तों की मजबूत कड़ी बना रहा। 18वीं सदी में डच ईस्ट इंडिया कंपनी ने यहाँ अपनी व्यापारिक पैठ जमाई, तो बाद में ब्रिटिश सेनाओं ने भी इसकी रणनीतिक अहमियत को भांपते हुए यहाँ कब्जा जमाया। सदियों का यह सफर साफ करता है कि यह द्वीप हमेशा से वैश्विक बिसात का एक अनिवार्य केंद्र रहा है।
आधुनिक इतिहास के पन्नों में खार्ग द्वीप की सबसे कठिन अग्निपरीक्षा 1980 से 1988 के ईरान-इराक युद्ध के दौरान हुई। उस भीषण दौर में इराक ने यहाँ के तेल टर्मिनलों पर बार-बार घातक प्रहार किए। इन हमलों का सीधा मकसद ईरान की आर्थिक रीढ़ को चोट पहुँचाना था, क्योंकि तेल निर्यात ही उसकी आय का सबसे बड़ा और बुनियादी स्रोत था। उस वक्त यह द्वीप महज एक भूखंड नहीं, बल्कि ईरान की समूची अर्थव्यवस्था के अस्तित्व को बचाने का सबसे बड़ा मोर्चा बनकर उभरा था।
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