खौफ के साये में बलूचिस्तान: धमाकों से दहल उठा सूबा, 190 से ज्यादा मौतें और सन्नाटे में डूबा क्वेटा
बलूचिस्तान के अशांत पहाड़ों और शहरों में पाकिस्तान की सेना अब उन अलगाववादियों की सरगर्मी से तलाश कर रही है, जिन्होंने सिलसिलेवार हमलों से पूरे सूबे को लहूलुहान कर दिया है। इस्लामाबाद ने इन हमलों की उंगली भारत की तरफ उठाने की कोशिश की, जिसे नई दिल्ली ने सिरे से खारिज करते हुए कड़ा जवाब दिया है। हिंसा के इस तांडव में पिछले दो दिनों के भीतर मौतों का आंकड़ा 190 के पार पहुंच गया है, जिसमें आम नागरिक, सुरक्षाकर्मी और हमलावर शामिल हैं।
प्रांतीय मुख्यमंत्री के मुताबिक, उग्रवादियों ने बैंक, जेल, पुलिस स्टेशन और सैन्य ठिकानों को अपना निशाना बनाया। इस भीषण हिंसा में कम से कम 31 नागरिकों और 17 सुरक्षाकर्मियों की जान जा चुकी है। जवाबी कार्रवाई में सेना ने अब तक 145 हमलावरों को ढेर करने का दावा किया है, जिनमें वे 40 आतंकवादी भी शामिल हैं जिन्हें शुक्रवार को मार गिराया गया था। फिलहाल, सेना प्रभावित इलाकों में बड़े पैमाने पर सर्च ऑपरेशन चला रही है।
एएफपी की रिपोर्ट बताती है कि बलूचिस्तान में जनजीवन पूरी तरह पटरी से उतर चुका है। पिछले दो दिनों से मोबाइल इंटरनेट सेवाएं ठप्प हैं, सड़कों पर पहिए थमे हुए हैं और रेल यातायात पूरी तरह निलंबित है। सूबे की राजधानी क्वेटा, जो कभी चहल-पहल से गुलजार रहती थी, आज किसी कब्रिस्तान की तरह खामोश है। 39 वर्षीय दुकानदार हमदुल्ला का कहना है, “अब घर से निकलने वाले को यह नहीं पता कि वह सलामत लौटेगा या नहीं। हर तरफ बस खौफ का माहौल है।” विस्फोटों की गूंज के बाद प्रमुख बाजार और सड़कें वीरान पड़ी हैं और लोग डर के मारे घरों में दुबक गए हैं।
बलूचिस्तान में विद्रोह की यह आग आज की नहीं, बल्कि दशकों पुरानी है। 1947 में विभाजन और ब्रिटिश शासन के अंत के बाद से ही बलूच समूह अपनी उपेक्षा का आरोप लगाते रहे हैं। उनका मानना है कि पंजाबी-बहुल पाकिस्तान में उनकी संस्कृति, भाषा और पहचान को दबाया जा रहा है। यही वजह है कि खनिज संपदा से भरपूर इस प्रांत में अलगाववादी समूह अक्सर सुरक्षा बलों, बाहरी नागरिकों और गैर-स्थानीय पाकिस्तानियों पर सशस्त्र हमले करते रहते हैं। अफगानिस्तान और ईरान की सीमा से सटे इस इलाके में तनाव की जड़ें अब और गहरी होती जा रही हैं।
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