तिब्बत में भूकंप की दोहरी मार: 4.5 और 3.2 तीव्रता के झटकों से दहली धरती, उथले केंद्र ने बढ़ाई चिंता
राष्ट्रीय भूकंप विज्ञान केंद्र (NCS) की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, बुधवार को तिब्बत के पर्वतीय क्षेत्र भूकंप के तेज झटकों से कांप उठे। यहाँ 4.5 तीव्रता का एक शक्तिशाली भूकंप दर्ज किया गया, जिसका केंद्र जमीन से 110 किलोमीटर की गहराई पर स्थित था। इसके ठीक बाद, तिब्बत में ही 3.2 तीव्रता का एक और भूकंप महसूस किया गया। हालांकि इसकी तीव्रता कम थी, लेकिन इसका केंद्र जमीन से मात्र 10 किलोमीटर की उथली गहराई पर होने के कारण प्रशासन ने भविष्य के झटकों (Aftershocks) की आशंका जताई है। NCS ने ‘एक्स’ (पूर्व में ट्विटर) पर विस्तृत जानकारी साझा करते हुए बताया कि 3.2 तीव्रता वाला यह भूकंप 03/02/2026 को भारतीय समयानुसार सुबह 10:17:43 बजे आया, जिसका केंद्र 28.80 उत्तर अक्षांश और 87.30 पूर्व देशांतर पर स्थित था।
वैज्ञानिक दृष्टि से, उथले भूकंप (Shallow Earthquakes) गहरे भूकंपों की तुलना में कहीं अधिक विनाशकारी होते हैं। इसका मुख्य कारण यह है कि उथले भूकंपों से उत्पन्न होने वाली ऊर्जा तरंगों को धरातल तक पहुँचने के लिए बहुत कम दूरी तय करनी पड़ती है। इसके परिणामस्वरूप जमीन में कंपन तीव्र होता है, जिससे इमारतों और जान-माल को नुकसान पहुँचने की संभावना कई गुना बढ़ जाती है।
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भौगोलिक रूप से, तिब्बती पठार अपनी विशेष विवर्तनिक हलचलों (Tectonic Activities) के लिए कुख्यात है। तिब्बत और नेपाल एक अत्यंत संवेदनशील भूवैज्ञानिक भ्रंश रेखा (Fault Line) पर बसे हुए हैं। यहाँ भारतीय विवर्तनिक प्लेट लगातार यूरेशियन प्लेट को ऊपर की ओर धकेल रही है, जिससे इस क्षेत्र में भूकंप एक नियमित घटना बन चुके हैं। यह विवर्तनिक उत्थान (Tectonic Uplift) इतना शक्तिशाली है कि यह समय के साथ हिमालय की ऊंची चोटियों के कद को भी बदलने की क्षमता रखता है।
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तिब्बती पठार की वर्तमान ऊँचाई और इसकी विशालता दरअसल भारतीय और यूरेशियन प्लेटों के बीच करोड़ों वर्षों से जारी भीषण टकराव का परिणाम है, जिसने हिमालय जैसी विशाल पर्वत श्रृंखला को जन्म दिया। भूगर्भ वैज्ञानिकों के अनुसार, पठार के भीतर भ्रंश (Faults) स्ट्राइक-स्लिप और सामान्य तंत्रों से जुड़े हैं। जीपीएस डेटा और उत्तर-दक्षिण दिशा में फैले ‘ग्रैबेन’ (Grabens) इस बात की पुष्टि करते हैं कि यह पठार पूर्व-पश्चिम दिशा में फैल रहा है। इसके उत्तरी भाग में ‘स्ट्राइक-स्लिप फॉल्टिंग’ हावी है, जबकि दक्षिण में प्रमुख विवर्तनिक क्षेत्र उत्तर-दक्षिण दिशा में सक्रिय ‘नॉर्मल फॉल्ट’ पर आधारित हैं, जो पूर्व-पश्चिम विस्तार को दर्शाते हैं।
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