मिसाइल रक्षा की पूरी प्रक्रिया अंतरिक्ष से शुरू होकर जमीन पर खत्म होती है। उपग्रह तो बस एक शुरुआती अलार्म का काम करते हैं, लेकिन असली मोर्चा संभालते हैं जमीन पर तैनात शक्तिशाली रडार। जैसे ही कोई मिसाइल दागी जाती है, ये रडार रेडियो तरंगों का जाल बिछा देते हैं। ये तरंगें मिसाइल से टकराकर जब वापस आती हैं, तो उसकी सटीक स्थिति और रफ्तार का पूरा कच्चा-चिट्ठा खोलकर रख देती हैं।
अमेरिकी सुरक्षा घेरे के दो सबसे बड़े योद्धा: लंबी दूरी का रडार (AN/FPS-132) लगभग 4,800 किमी की विशाल दूरी तक नजर रख सकता है। वहीं, AN/TPY-2 रडार 3,200 किमी के दायरे में बेहद सटीक डेटा प्रदान करता है। टीपीवाई-2 को अक्सर मिसाइल इंटरसेप्टर हथियारों के पास ही लगाया जाता है, ताकि खतरे की जानकारी मिलते ही उसे तुरंत हवा में ही ध्वस्त किया जा सके।
सरल शब्दों में कहें तो उपग्रह मिसाइल के उठने की खबर देते हैं और रडार उसकी पूरी उड़ान के दौरान उस पर बाज जैसी नजर बनाए रखते हैं।
हालांकि, हाल ही में ईरानी बलों ने जॉर्डन और कतर में स्थित इन महत्वपूर्ण रडार केंद्रों को निशाना बनाकर अमेरिका की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। ये रडार प्रणालियां न केवल अत्यधिक महंगी हैं, बल्कि इन्हें तुरंत रिप्लेस करना भी टेढ़ी खीर है। इसी संकट से निपटने के लिए अमेरिका को मजबूरी में कोरिया से अपना एक टीपीवाई-2 रडार हटाकर पश्चिम एशिया के मोर्चे पर तैनात करना पड़ा है।
भले ही इन हमलों से अमेरिकी निगरानी तंत्र को थोड़ी चोट पहुंची है, लेकिन यह पूरी तरह नाकाम नहीं हुआ है। अमेरिका के पास अब भी ब्रिटेन जैसे सहयोगियों के रडार सिस्टम का बैकअप मौजूद है, जो इस रक्षा दीवार को मजबूती दे रहे हैं।
इसके साथ ही, समुद्र में तैनात अमेरिकी नौसेना के जहाजों पर लगा ‘एजिस कॉम्बैट सिस्टम’ (AN/SPY-1 रडार) एक मोबाइल ढाल की तरह काम करता है। यह करीब 322 किलोमीटर के दायरे में दुश्मन की हर हरकत पर नजर रखता है। इन जहाजों की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इन्हें जरूरत के हिसाब से किसी भी खतरे वाले क्षेत्र के बिल्कुल करीब ले जाया जा सकता है।
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