कच्चा तेल $100 के पार: क्या अब आपकी जेब पर भारी पड़ेगा पेट्रोल-डीजल का झटका?
वैश्विक ऊर्जा बाज़ार में एक बार फिर खलबली मची है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ब्रेंट क्रूड (Brent Crude) की कीमतों ने $100 प्रति बैरल का मनोवैज्ञानिक स्तर पार कर लिया है। यह उछाल भारत के लिए बड़ी चिंता का विषय है, क्योंकि हम अपनी तेल ज़रूरतों का लगभग 85% हिस्सा आयात करते हैं। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या लंबे समय से स्थिर चल रही पेट्रोल और डीज़ल की कीमतें अब बढ़ने वाली हैं?
क्या पेट्रोल की कीमतों में होने वाली है बढ़ोतरी?
कच्चे तेल की कीमतों में एक दिन की तेज़ी का मतलब यह कतई नहीं है कि अगली सुबह ही पेट्रोल पंपों पर दाम बढ़ जाएंगे। तेल कंपनियाँ अक्सर अपने मौजूदा स्टॉक, रिफाइनिंग मुनाफ़े और आंतरिक रिज़र्व का उपयोग कर शुरुआती झटकों को सोख लेती हैं। लेकिन, यदि कच्चा तेल हफ़्तों तक $100 के स्तर पर बना रहा, तो दबाव असहनीय हो जाएगा। Infomerics Ratings के मुख्य अर्थशास्त्री, मनोरंजन शर्मा के अनुसार, “अगर कीमतें $100 के करीब टिकी रहती हैं, तो दामों को स्थिर रखने की क्षमता एक तिमाही से भी कम रह सकती है।” उन्होंने चेतावनी दी कि यदि सरकार से मदद नहीं मिली, तो प्रति लीटर 3 से 4 रुपये का घाटा उठाना कंपनियों के लिए नामुमकिन होगा।
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कीमतों को थामे रखने की कितनी बड़ी है कीमत?
फिलहाल इस भारी बोझ का बड़ा हिस्सा तेल मार्केटिंग कंपनियाँ (OMCs) अपने कंधों पर उठाए हुए हैं। Geojit Investments Limited के रिसर्च एनालिस्ट, अरुण कैलासन ने खुलासा किया कि जब कच्चा तेल $95 प्रति बैरल था, तब भी भारतीय कंपनियाँ हर दिन करीब 1,600 करोड़ रुपये (महीने के 48,000 करोड़ रुपये) का नुकसान उठा रही थीं। उनका कहना है कि, “कंपनियों के मुनाफ़े के रिज़र्व अब लगभग खत्म होने की कगार पर हैं। ऐसी स्थिति में, बिना सरकारी मदद या कीमतों में बढ़ोतरी के मौजूदा स्तर को बनाए रखना बेहद मुश्किल होगा।” $100 के पार कच्चे तेल की कीमत इस घाटे को और भी खतरनाक बना सकती है।
महंगाई की दस्तक में अभी और कितना वक्त है?
सब कुछ इस बात पर टिका है कि कच्चा तेल कितनी देर तक ‘गर्म’ रहता है। पुनीत सिंघानिया (डायरेक्टर – मास्टर कैपिटल सर्विसेज़ लिमिटेड) का मानना है कि असली अग्निपरीक्षा तब शुरू होती है जब कच्चा तेल $100 के ऊपर टिक जाए।
उन्होंने स्पष्ट किया, “असली संकट तब आता है जब कीमतें $100 प्रति बैरल से ऊपर बनी रहती हैं। यही वह बिंदु है जहाँ मार्जिन पर भारी दबाव आता है और कैश फ्लो सूखने लगता है।”
सिंघानिया के अनुसार, अगर तेल $85 से $95 की रेंज में रहता है, तो कंपनियाँ शायद एक-दो तिमाही तक मोर्चा संभाल लें, भले ही उनका मुनाफ़ा कम हो जाए। लेकिन इससे ऊपर जाने पर गणित बिगड़ सकता है।
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वर्तमान में, पेट्रोल-डीज़ल की कीमतों में तत्काल वृद्धि का कोई आधिकारिक आदेश नहीं है। लेकिन यदि अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में आग लगी रही, तो नीति-निर्माताओं के पास सीमित विकल्प बचेंगे: या तो धीरे-धीरे कीमतें बढ़ाई जाएं, टैक्स में कटौती कर जनता को राहत दी जाए, या फिर तेल कंपनियाँ इस घाटे को और कुछ समय तक सहें।
PwC इंडिया के पार्टनर (ऑयल एंड गैस लीडर), मनस मजूमदार के मुताबिक, भारतीय तेल कंपनियों ने पिछले दो वर्षों में जो ‘सुरक्षा कोष’ (बफ़र) तैयार किया था, वह अगले तीन से चार महीनों में पूरी तरह समाप्त हो सकता है।
निष्कर्ष: क्या आपको महंगाई के लिए तैयार रहना चाहिए? शायद तुरंत नहीं, लेकिन अगर कच्चा तेल $90-$100 के ऊपर अपनी पकड़ मजबूत रखता है, तो पेट्रोल-डीजल की कीमतों में बढ़ोतरी केवल समय की बात होगी। यह वृद्धि उम्मीद से कहीं अधिक तेज़ भी हो सकती है।
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