भारत की अर्थव्यवस्था: विकास का रथ और महंगाई का ठहराव – RBI के सामने नई चुनौती!
हालिया जारी हुए भारत के आर्थिक आंकड़ों ने जहाँ देश के आर्थिक गलियारों में हलचल मचा दी है, वहीं इसने एक रोमांचक बहस को भी जन्म दिया है। प्राप्त जानकारी के अनुसार, जुलाई-सितंबर तिमाही में भारतीय अर्थव्यवस्था ने 8.2% की अप्रत्याशित तेजी दर्ज की है, जिसने कई विश्लेषकों को वित्त वर्ष की विकास दर को 7% से ऊपर ले जाने के लिए प्रेरित किया है। खास बात यह है कि यह वृद्धि उस आदर्श दर के करीब है, जहाँ अर्थव्यवस्था बिना किसी अतिरिक्त मुद्रास्फीति के निरंतर विकास कर सकती है।
दिलचस्प बात यह है कि यह मजबूत विकास दर ऐसे समय में आई है, जब खुदरा महंगाई अक्टूबर में 0.25% के रिकॉर्ड-निम्न स्तर पर आ गई है। यह स्थिति केंद्रीय बैंक के लिए एक अनोखी दुविधा प्रस्तुत करती है। जहाँ एक ओर कम महंगाई आमतौर पर नीतिगत ब्याज दरों में कटौती का मार्ग प्रशस्त करती है, वहीं दूसरी ओर मजबूत आर्थिक विकास इस कटौती के पक्ष में तर्कों को कमजोर करता है।
IDFC फर्स्ट बैंक की मुख्य अर्थशास्त्री, गौरा सेन गुप्ता, इस स्थिति को स्पष्ट करते हुए कहती हैं कि दिसंबर की RBI नीति बैठक ऐसे माहौल में होगी जहाँ ‘ग्रोथ’ अपने चरम पर है और ‘इंफ्लेशन’ (महंगाई) अत्यंत निचले स्तर पर। उनके अनुसार, “ऐसे हालात में ‘पॉज़’ (विराम) लेना अधिक तर्कसंगत लगता है, और कटौती का सहारा तभी लेना चाहिए जब आर्थिक जोखिम अधिक स्पष्ट हों।”
पहले से ही अधिकांश अर्थशास्त्री यह अनुमान लगा रहे थे कि 5 दिसंबर को RBI 25 बेसिस पॉइंट की कटौती कर सकता है, जिससे रेपो रेट 5.25% तक गिर जाएगा। यह उल्लेखनीय है कि RBI ने इस वर्ष की पहली छमाही में 100 बेसिस पॉइंट की कटौती की है और अगस्त के बाद से दरों को अपरिवर्तित रखा है।
RBI गवर्नर, संजय मल्होत्रा, ने भी हाल ही में संकेत दिया था कि दरें घटाने की गुंजाइश है, लेकिन अंतिम निर्णय मौद्रिक नीति समिति के सामूहिक विवेक पर निर्भर करेगा। वहीं, ICICI सिक्योरिटीज प्राइमरी डीलरशिप के मुख्य अर्थशास्त्री, ए. प्रसन्ना, का मानना है कि महंगाई अपेक्षा से कहीं अधिक नरम पड़ी है और भविष्य का परिदृश्य भी अनुकूल दिख रहा है, इसलिए 25 बेसिस पॉइंट की एक और कटौती उचित हो सकती है।
वर्तमान में, वास्तविक ब्याज दर, यानी रेपो रेट में से महंगाई घटाने के बाद मिलने वाला अंतर, काफी अधिक है, जिसके चलते कई विशेषज्ञ कटौती की आवश्यकता महसूस कर रहे हैं। हालाँकि, कुछ विश्लेषकों का मानना है कि वित्त वर्ष की दूसरी छमाही में विकास दर धीमी पड़ सकती है। इसका कारण अमेरिका द्वारा भारतीय वस्तुओं पर 50% आयात शुल्क लागू करना है, जिससे निर्यात और रोजगार दोनों पर दबाव पड़ने की आशंका है।
Barclays ने GDP के मजबूत आंकड़ों के बाद कहा है कि अब दर कटौती की संभावना पहले के अनुमानों की तुलना में कम नजर आ रही है। इसके बावजूद, निवेशक अभी भी इस उम्मीद में हैं कि RBI महंगाई के नए अनुमान को और घटाकर 2.6% से नीचे ला सकता है, जबकि पूरे वर्ष के लिए GDP वृद्धि का लक्ष्य भी बढ़ाया जा सकता है।
संक्षेप में, भारत की असाधारण आर्थिक वृद्धि और ऐतिहासिक रूप से निम्न महंगाई ने RBI के सामने एक जटिल संतुलन साधने का अवसर प्रस्तुत किया है। अब सभी की निगाहें 5 दिसंबर को होने वाली महत्वपूर्ण बैठक पर टिकी हुई हैं।
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