भारत-EU व्यापार समझौता: 20 लाख करोड़ डॉलर के बाजार का खुलेगा द्वार, पीयूष गोयल ने बताया इसे ‘गेम-चेंजर’
वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने भारत और यूरोपीय संघ (EU) के बीच हुए मुक्त व्यापार समझौते (FTA) को भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक ऐतिहासिक ‘गेम-चेंजर’ करार दिया है। इस दूरगामी समझौते के तहत भारतीय उत्पादों के लिए यूरोपीय बाजार के दरवाजे पूरी तरह खुल जाएंगे, जहां मूल्य के हिसाब से 99 प्रतिशत से अधिक निर्यात पर रियायती शुल्क या ड्यूटी-फ्री पहुंच मिलेगी। इससे विशेष रूप से देश के श्रम-प्रधान क्षेत्रों को जबरदस्त मजबूती मिलेगी। गौरतलब है कि दोनों पक्षों ने 27 जनवरी को इस महा-समझौते की औपचारिक घोषणा की थी।
पीयूष गोयल ने सोशल मीडिया के माध्यम से इस उपलब्धि को साझा करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन और यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष एंटोनियो कोस्टा के नेतृत्व में भारत और यूरोपीय संघ ने इस ऐतिहासिक दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए हैं। गोयल ने जोर देकर कहा कि यह समझौता देश की वैश्विक व्यापार रणनीति में एक मील का पत्थर है, जो 1.4 अरब भारतीयों के लिए 20 हजार अरब डॉलर वाले विशाल यूरोपीय बाजार में संभावनाओं के नए क्षितिज खोलेगा।
उन्होंने विश्वास जताया कि यह समझौता ‘मेक इन इंडिया’ अभियान को नई ऊर्जा प्रदान करेगा। दुनिया की चौथी (भारत) और दूसरी (EU) सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच हुई यह साझेदारी वैश्विक व्यापार के लगभग एक-तिहाई हिस्से का प्रतिनिधित्व करती है। गोयल ने बताया कि इस समझौते का सीधा लाभ हमारे एमएसएमई (MSMEs), महिलाओं, युवाओं, कारीगरों, श्रमिकों, छात्रों, कुशल पेशेवरों के साथ-साथ मछुआरों, किसानों और निर्यातकों को मिलेगा।
मंत्री ने स्पष्ट किया कि जहां एक ओर उच्च मूल्य वाले यूरोपीय बाजार में बड़े पैमाने पर अवसर तलाशे गए हैं, वहीं दूसरी ओर भारत के संवेदनशील क्षेत्रों और ग्रामीण आजीविका को सुरक्षित रखने के लिए भी पुख्ता सावधानी बरती गई है। उन्होंने सेवा क्षेत्र में मिली सफलता को एक बड़ी जीत बताया और कहा कि भविष्य के अनुकूल गतिशीलता ढांचे से भारतीय पेशेवरों के लिए वैश्विक अवसरों का विस्तार होगा।
पीयूष गोयल के अनुसार, यह समझौता ‘भविष्य का प्रवेश द्वार’ है। इससे न केवल उच्च-मूल्य वाली नौकरियां पैदा होंगी और नवाचार को गति मिलेगी, बल्कि वैश्विक स्तर पर प्रतिभा और सतत आर्थिक विकास के एक प्रतिस्पर्धी केंद्र के रूप में भारत की स्थिति और अधिक सशक्त होगी।
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