यूपीआई की मुफ्त सेवा पर आरबीआई गवर्नर का स्पष्टीकरण: क्या है पूरा सच?
नई दिल्ली: यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस (यूपीआई) पर शुल्क लगने की अटकलों के बीच भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के गवर्नर संजय मल्होत्रा ने बुधवार को एक महत्वपूर्ण खुलासा किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि यूपीआई लेनदेन पर तत्काल कोई शुल्क लगाने का प्रस्ताव नहीं है, लेकिन उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि इस प्रणाली के परिचालन से जुड़े खर्चों को वहन करना होगा।
आरबीआई गवर्नर ने मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) की बैठक के बाद कहा, "मैंने कभी यह नहीं कहा कि यूपीआई हमेशा मुफ्त रहेगा, लेकिन मैंने यह जरूर कहा था कि इसके संचालन में कुछ खर्च आता है और उसे किसी न किसी को वहन करना होगा।" उन्होंने पिछली नीतिगत बैठकों में भी इसी तरह का स्पष्टीकरण दिया था।
यूपीआई की बढ़ती लोकप्रियता:
नेशनल पेमेंट्स कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (एनपीसीआई) के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, सितंबर में यूपीआई लेनदेन की संख्या 19.63 बिलियन को पार कर गई, जो पिछले साल की तुलना में 31% की वृद्धि है। इसी तरह, लेनदेन की राशि भी 21% बढ़कर 24.90 लाख करोड़ रुपये हो गई। अगस्त में यह आंकड़ा 24.85 लाख करोड़ रुपये था।
एनपीसीआई के आंकड़ों से पता चलता है कि औसत दैनिक लेनदेन की संख्या 654 मिलियन और औसत दैनिक लेनदेन की राशि 82,991 करोड़ रुपये तक पहुंच गई है। अगस्त में, यह संख्या क्रमशः 645 मिलियन और 80,177 करोड़ रुपये थी। अगस्त में ही यूपीआई लेनदेन की संख्या पहली बार 20 बिलियन के पार हुई थी।
आरबीआई की मौद्रिक नीति:
इस बीच, आरबीआई की मौद्रिक नीति समिति ने रेपो रेट को 5.5% पर अपरिवर्तित रखने का फैसला किया है। समिति ने एक "न्यूट्रल" नीतिगत रुख भी बनाए रखा है, जिसका अर्थ है कि मुद्रास्फीति को नियंत्रित करते हुए विकास को बढ़ावा देने का प्रयास किया जाएगा।
आरबीआई गवर्नर ने बताया कि खाद्य कीमतों में गिरावट और जीएसटी दरों में कटौती के कारण मुद्रास्फीति के अनुमानों में सुधार हुआ है। इसके चलते, आरबीआई ने 2025-26 के लिए औसत मुद्रास्फीति दर का अनुमान 3.1% से घटाकर 2.6% कर दिया है।
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