बिहार चुनाव: मौन अवधि में आयोग की सख्ती, कार्यकर्ताओं की रणनीति पर एक नज़र
पटना: भारत निर्वाचन आयोग (ईसीआई) ने बिहार विधानसभा चुनावों और उपचुनावों के मद्देनज़र, मतदान से पहले अनिवार्य ‘मौन अवधि’ के दौरान चुनाव संबंधी सामग्री के प्रकाशन पर सख्त पाबंदियों को लेकर मीडिया आउटलेट्स और प्रसारकों को जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के प्रावधानों का कड़ाई से पालन करने की याद दिलाई है। बिहार में मतदान दो चरणों में, 6 नवंबर और 11 नवंबर को होगा।
कानूनी बंधन और आयोग की चेतावनी:
अधिनियम की धारा 126(1)(बी) के तहत, मतदान समाप्त होने से ठीक पहले की 48 घंटे की अवधि में, मतदान क्षेत्र में किसी भी प्रकार के माध्यम से, जैसे टेलीविजन, रेडियो या अन्य समान मीडिया पर चुनावी सामग्री का प्रदर्शन प्रतिबंधित है। चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया है कि टीवी और रेडियो चैनलों के साथ-साथ केबल नेटवर्क को भी यह सुनिश्चित करना होगा कि इस अवधि के दौरान प्रसारित होने वाले कार्यक्रमों में ऐसी कोई भी सामग्री न हो – जिसमें किसी पैनलिस्ट के विचार या अपील शामिल हों – जो किसी पार्टी या उम्मीदवार की संभावनाओं को बढ़ावा देने या पूर्वाग्रहित करने वाली मानी जा सके।
राजनीतिक सरगर्मी और कार्यकर्ता की भूमिका:
बिहार में गुरुवार (6 नवंबर) को पहले चरण का मतदान होना है, जहाँ सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) अपनी सत्ता बचाने की जुगत में है, वहीं महागठबंधन विधानसभा चुनावों में मजबूत वापसी का सपना देख रहा है। पहले चरण में 18 जिलों की 121 सीटों पर कुल 1,314 उम्मीदवार अपनी किस्मत आजमा रहे हैं, और करीब 3.75 लाख मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे।
यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि जब प्रचार-प्रसार आधिकारिक तौर पर थम जाता है, तो राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता इस महत्वपूर्ण दिन क्या करते हैं? आइए, विस्तार से समझते हैं कि मतदान से ठीक पहले उन्हें किन महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों से नवाज़ा जाता है और वे किस तरह की राजनीतिक गतिविधियों में व्यस्त रहते हैं।
पार्टी किट का वितरण: चुनाव की बुनियाद
पार्टी कार्यकर्ताओं का पहला और सबसे महत्वपूर्ण काम बूथ अध्यक्षों को आवश्यक किटों का वितरण करना है। इन किटों में उस विशेष वार्ड की मतदाता सूची, उम्मीदवार का नाम, फोटो, पार्टी का नाम, चुनाव चिन्ह, पार्टी का झंडा और कुछ अंतिम समय की प्रचार सामग्री शामिल होती है। किट में एक महत्वपूर्ण फॉर्म भी होता है जिसे रिटर्निंग ऑफिसर को जमा करना होता है, और इसका उपयोग मतदान केंद्र पर मतदान एजेंट की नियुक्ति के लिए किया जाता है। इसके साथ ही, किट में पार्टी द्वारा निर्धारित भत्ता भी होता है, जो 500 रुपये से 1,500 रुपये तक हो सकता है।
मतदान एजेंटों का चयन: निष्पक्षता की निगरानी
इस दिन बूथ अध्यक्षों की एक और अहम जिम्मेदारी मतदान एजेंटों का चयन करना होता है। वे चुने हुए स्थानीय व्यक्ति को मतदान केंद्र के अंदर की मतदान प्रक्रिया के बारे में विस्तृत जानकारी देते हैं। मतदान एजेंट बनने वाले व्यक्ति को अगले दिन मतदान शुरू होने से पहले, किट में दिए गए फॉर्म को रिटर्निंग ऑफिसर के पास जमा करना अनिवार्य होता है। मतदान एजेंट, उम्मीदवार की ओर से अधिकृत होता है और उसका मुख्य कार्य बूथ पर निष्पक्ष मतदान की बारीक से निगरानी करना होता है। मतदान शुरू होने से पहले, एजेंट ईवीएम पर होने वाले मॉक पोल में भी भाग लेता है।
रणनीतिक संशोधन: मौन दिवस का सदुपयोग
चुनावी प्रचार के थमने का दिन, पार्टी कार्यकर्ताओं को मतदान दिवस के लिए अपनी रणनीति में आवश्यक संशोधन करने का एक अनमोल अवसर भी प्रदान करता है। चूंकि अधिकांश मतदाता अपना मन बना चुके होते हैं, इसलिए कार्यकर्ताओं का ध्यान अब इस बात पर केंद्रित हो जाता है कि कैसे सुनिश्चित किया जाए कि उनके समर्पित मतदाता मतदान केंद्रों तक पहुँचें। इस योजना में उन लोगों को विशेष रूप से प्रोत्साहित करना भी शामिल है जो आमतौर पर मतदान के प्रति उदासीन रहते हैं।
मतदाता पर्चियाँ पहुँचाना: अंतिम प्रयास
जब आप मतदान करने जाते हैं, तो अपनी पहचान सत्यापित करने के साथ-साथ मतदाता सूची में अपना नाम खोजने में मदद के लिए एक मतदाता पर्ची की आवश्यकता होती है। सामान्यतः, बीएलओ (ब्लॉक लेवल ऑफिसर) इन पर्चियों को घरों तक पहुँचाते हैं। लेकिन, उन मामलों में जहाँ पर्चियाँ कुछ मतदाताओं तक नहीं पहुँच पातीं, वहाँ किसी पार्टी का बूथ अध्यक्ष उन पर्चियों को प्रिंट करवाकर उन तक पहुँचाने का जिम्मा उठाता है। यह कार्य कभी-कभी मतदान के दिन, मतदान केंद्र के बाहर भी संपादित किया जाता है।
प्रतिद्वंद्वी कार्यकर्ताओं पर पैनी नज़र
इन सभी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों के साथ-साथ, कार्यकर्ता अपने प्रतिद्वंद्वी दलों के सदस्यों पर भी बारीक नज़र रखते हैं। वे इस बात की निगरानी करते हैं कि विरोधी दल के सदस्य अंतिम समय में किसी भी वादे या प्रलोभन से मतदाताओं को प्रभावित न करें। उनकी यह सतर्कता सुनिश्चित करती है कि कोई भी व्यक्ति मतदाताओं को गुमराह न कर सके या उनका वोट खरीदने का प्रयास न करे। यह निष्पक्ष चुनाव के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि मतदान समाप्त होने तक सभी उम्मीदवारों के लिए समान अवसर बने रहने चाहिए।
बिहार विधानसभा चुनाव 2025: एक विस्तृत परिदृश्य
इस महीने की शुरुआत में, चुनाव आयोग ने बिहार विधानसभा चुनाव की तारीखों की घोषणा की थी। 243 विधानसभा सीटों के लिए 6 नवंबर और 11 नवंबर को दो चरणों में मतदान होगा, जबकि मतगणना 14 नवंबर को संपन्न होगी। इस बार, भाजपा और जद(यू) के नेतृत्व वाले एनडीए का मुकाबला राजद के तेजस्वी यादव के नेतृत्व वाले महागठबंधन से होगा, जिसमें भारतीय जनता पार्टी (भाजपा), कांग्रेस, दीपांकर भट्टाचार्य के नेतृत्व वाली भाकपा (माले), भाकपा, माकपा और मुकेश सहनी की विकासशील इंसान पार्टी (वीआईपी) भी शामिल हैं। वहीं, प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी ने भी राज्य की सभी 243 सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े किए हैं।
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