बिहार चुनाव 2025: सारण की परसा सीट पर यादवों का अभेद्य किला, 70 सालों का इतिहास क्या बदलेगा?
बिहार में विधानसभा चुनावों की सरगर्मी तेज हो गई है। मुख्य चुनाव आयुक्त के दो दिवसीय दौरे और विभिन्न दलों के प्रतिनिधियों से मुलाकात के बाद, अगले हफ्ते चुनाव की तारीखों का ऐलान हो सकता है। ऐसे में, जब पूरा राज्य एक बार फिर चुनावी रंग में रंगने को तैयार है, हम आपको बिहार की एक ऐसी अनोखी विधानसभा सीट से रूबरू कराते हैं, जिसने पिछले 18 चुनावों में एक ही जाति के नेताओं को विधायक बनाया है।
परसा: जातीय निष्ठा का अखाड़ा
बिहार के सारण जिले में स्थित परसा विधानसभा सीट, एक ऐसा राजनीतिक परिदृश्य प्रस्तुत करती है जहाँ जातीय निष्ठा का बोलबाला है। 1951 में अस्तित्व में आई इस सीट पर आज तक कोई भी गैर-यादव उम्मीदवार विधानसभा नहीं पहुंच पाया है। मतदाताओं की यह अटूट प्रतिबद्धता इतनी गहरी है कि नेताओं के दल बदलने से भी उनकी पसंद पर कोई फर्क नहीं पड़ता। यूं तो पिछले कुछ चुनावों में राजद और जदयू के बीच मुख्य मुकाबला रहा है, लेकिन इस सीट का समीकरण हमेशा से यादव उम्मीदवार के पक्ष में ही रहा है।
1952 से 2020 तक: एक अटूट परंपरा
1952 में कांग्रेस के टिकट पर दरोगा प्रसाद राय इस सीट से पहले विधायक बने। अगले सात चुनावों तक जनता का भरोसा उन पर बना रहा। 1977 में जनता पार्टी के टिकट पर रामानंद प्रसाद यादव, जो स्वयं यादव समुदाय से थे, ने जीत दर्ज की। इसके बाद, 1985 में जनता ने एक बार फिर दरोगा प्रसाद राय के परिवार पर भरोसा जताया। दरोगा प्रसाद राय के पुत्र चंद्रिका राय ने पिता की विरासत संभाली और लगातार पांच बार विधानसभा पहुंचे। हालांकि, उन्होंने अपने राजनीतिक सफर में कई पार्टियों का दामन बदला, लेकिन जीत का सिलसिला जारी रहा। 2015 में छठी बार जीत दर्ज करने के बाद, 2020 में छोटे लाल राय ने राजद के टिकट पर जीत हासिल की, जो वे भी यादव समुदाय से ही थे।
ऐश्वर्या राय और तेजप्रताप यादव: एक चर्चित रिश्ता
परसा सीट के इतिहास में एक और दिलचस्प अध्याय तब जुड़ा जब बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री दरोगा प्रसाद राय की पोती और चंद्रिका राय की बेटी, ऐश्वर्या राय का विवाह लालू प्रसाद यादव के बेटे तेजप्रताप यादव से हुआ। हालांकि, यह रिश्ता ज्यादा दिनों तक नहीं चला, और इसके चलते चंद्रिका राय ने राजद से इस्तीफा दे दिया, जिसका असर उनके अगले चुनाव पर भी पड़ा।
क्या इस बार परसा की जनता अपने 70 साल पुराने इतिहास को दोहराएगी, या कोई नया अध्याय लिखा जाएगा? यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा, लेकिन फिलहाल यह सीट जातीय समीकरणों और राजनीतिक दांव-पेच का एक अनूठा उदाहरण बनी हुई है।
Discover more from Aware Media News - Hindi News, Breaking News & Latest Updates
Subscribe to get the latest posts sent to your email.
