दलित समुदाय में स्वास्थ्य चिंताजनक: शिशु और मातृ मृत्यु दर में चिंताजनक वृद्धि
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 (NFHS-5) के आँकड़े दलित समुदाय के स्वास्थ्य के प्रति एक गंभीर चिंता का विषय उजागर करते हैं। जहाँ एक ओर देश और राज्य शिशु मृत्यु दर को कम करने के लिए प्रयासरत हैं, वहीं दलित बच्चों की जीवन रक्षा एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। NFHS-5 के अनुसार, दलितों में प्रति 1,000 जीवित शिशुओं पर शिशु मृत्यु दर 55 दर्ज की गई है। यह आँकड़ा जहाँ राज्य के औसत 47 और राष्ट्रीय औसत 37 से काफी अधिक है, वहीं यह स्पष्ट रूप से इस समुदाय की स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच और गुणवत्ता में असमानता को दर्शाता है।
यह विसंगति केवल नवजात शिशुओं तक ही सीमित नहीं है। मातृ स्वास्थ्य के मोर्चे पर भी स्थिति चिंताजनक है। रिपोर्ट बताती है कि दलित महिलाओं में मातृ मृत्यु दर प्रति 1,000 जीवित शिशुओं के जन्म पर 130 आँकी गई है। यह दर भी राज्य के औसत 118 और राष्ट्रीय औसत 97 से काफी ऊपर है, जो गर्भवती महिलाओं के लिए उचित स्वास्थ्य देखभाल की कमी और अन्य सामाजिक-आर्थिक बाधाओं की ओर इशारा करती है।
इन स्वास्थ्य संबंधी आँकड़ों के पीछे की मूल वजहें भी NFHS-5 की रिपोर्ट में सामने आई हैं। यह उजागर हुआ है कि 84 प्रतिशत से अधिक दलित परिवार भूमिहीन हैं। भूमि का अभाव न केवल उनकी आर्थिक स्थिति को कमजोर करता है, बल्कि अप्रत्यक्ष रूप से उनके स्वास्थ्य और जीवन स्तर को भी प्रभावित करता है। केवल सात प्रतिशत दलित परिवारों के पास ही खेती योग्य जमीन है, जो उनकी आजीविका के सीमित साधनों का प्रतीक है। भूमिहीनता और सीमित आर्थिक संसाधन, कुपोषण, बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुँच की कमी, और सामाजिक बहिष्कार जैसी समस्याओं को जन्म देते हैं, जो सीधे तौर पर शिशु और मातृ मृत्यु दर में वृद्धि का कारण बनती हैं। ये आँकड़े एक निर्णायक कार्रवाई की मांग करते हैं ताकि दलित समुदाय के स्वास्थ्य में सुधार लाया जा सके और उन्हें देश के अन्य नागरिकों के समान स्वास्थ्य अधिकार प्राप्त हो सकें।
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