आदित्य धर के निर्देशन में बनी ‘धुरंधर: द रिवेंज’ महज एक जासूसी थ्रिलर नहीं है, बल्कि यह एक साधारण पंजाबी गबरू के ‘देशभक्त जासूस’ में तब्दील होने की रूह कंपा देने वाली दास्तान है। फिल्म में रणवीर सिंह ने जसकीरत सिंह रंगी और हमज़ा अली मज़ारी की दोहरी जिंदगी को जिस शिद्दत से जिया है, उसने दर्शकों के कलेजे को झकझोर दिया है। आइए जानते हैं कि कैसे पठानकोट का एक मासूम नौजवान पाकिस्तान के आतंकी कैंपों का सबसे भरोसेमंद और खौफनाक चेहरा ‘हमज़ा’ बन गया।
## पठानकोट की त्रासदी: जब सिस्टम ने तोड़ा दम
जसकीरत सिंह रंगी की कहानी 21 साल के उस महत्वाकांक्षी युवक से शुरू होती है, जो अपने पिता के नक्शेकदम पर चलकर भारतीय सेना में भर्ती होने का ख्वाब देखता था। लेकिन एक ज़मीनी विवाद ने उसके हंसते-खेलते संसार को राख कर दिया। एक रसूखदार विधायक के गुंडों ने न केवल उसके पिता की बेरहमी से हत्या की, बल्कि उसकी बहनों के साथ भी दरिंदगी की। जब सत्ता के दबाव में पुलिस और कानून ने साथ छोड़ दिया, तो जसकीरत का न्याय से भरोसा उठ गया। अपने परिवार की बर्बादी का बदला लेने के लिए उसने खुद हथियार उठाए और विधायक के घर पर कहर बनकर टूटते हुए 12 लोगों को मौत के घाट उतार दिया।
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## कालकोठरी से RAW के ‘ऑपरेशन धुरंधर’ का सफर
हत्या के आरोप में जसकीरत को फांसी की सजा सुनाई गई, लेकिन उसकी बेखौफ बहादुरी और अचूक निशानेबाजी ने RAW अफसर अजय सान्याल (आर. माधवन) का ध्यान अपनी ओर खींच लिया। सान्याल ने उसके सामने एक कठिन विकल्प रखा: “या तो फांसी के फंदे पर झूलो, या फिर देश के लिए एक गुमनाम मौत चुनो।” जसकीरत ने दूसरे रास्ते को गले लगाया। कड़ी ट्रेनिंग के बाद उसका पुराना वजूद मिटा दिया गया और उसे एक नई पहचान मिली— हमज़ा अली मज़ारी। पहली फिल्म ‘धुरंधर’ में हमने देखा कि कैसे वह हमज़ा बनकर पाकिस्तान में पैठ बनाता है और कट्टरपंथी संगठनों का हिस्सा बनकर भारत के लिए बेहद गोपनीय सूचनाएं जुटाता है। रणवीर सिंह ने इस किरदार के उस ‘खामोश दर्द’ को पर्दे पर उतारा है, जहाँ एक इंसान अपनी मिट्टी और अपनी भाषा को त्यागकर दुश्मन बनकर जीने पर मजबूर है।
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## हमज़ा का जन्म और वजूद
जेल की सलाखों के पीछे से निकलकर जसकीरत ने जिस कठिन ट्रेनिंग से खुद को तपाया, वहीं से हमज़ा अली मज़ारी का जन्म हुआ। पहली फिल्म ‘धुरंधर’ पूरी तरह से पाकिस्तान के भीतर उसकी जोखिम भरी जासूसी गतिविधियों पर केंद्रित है। रणवीर सिंह के बेमिसाल अभिनय ने जसकीरत के भीतर छिपे उस जख्मी इंसान को दर्शकों के करीब ला दिया है। ‘धुरंधर: द रिवेंज’ दरअसल प्रतिशोध, पारिवारिक त्रासदी और राष्ट्र के लिए खुद को मिटा देने के सर्वोच्च बलिदान की एक अमर गाथा है।
## हमज़ा के किरदार का मार्मिक अंत
‘धुरंधर: द रिवेंज’ के क्लाइमेक्स में हमज़ा सुरक्षित भारत लौट आता है, लेकिन उसे अपनी पाकिस्तानी पत्नी यालिना और बेटे ज़यान को पीछे छोड़ना पड़ता है। अपनी मूल पहचान ‘जसकीरत’ में लौटकर वह दिल्ली से सीधे पठानकोट अपनी मां से मिलने जाता है। वहां अपनी मां को अपनी बहन और उसके बच्चों के साथ खुशहाल देखकर उसकी आंखों से आंसू छलक पड़ते हैं। तभी उसे ट्रेनिंग के दौरान कहे गए वे शब्द याद आते हैं— ‘बलिदान परमो धर्मः’ (बलिदान ही सबसे बड़ा धर्म है)। वह बिना मिले ही वहां से वापस मुड़ जाता है, क्योंकि उसके परिवार के लिए वह बहुत पहले ही मर चुका था। फिल्म के आखिरी कुछ सेकंड में, जसकीरत को एक मिलिट्री कैंप में अपनी ट्रेनिंग फिर से शुरू करते हुए दिखाया गया है, जो एक नए मिशन का संकेत है।
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