जब बेंगलुरु आश्रम में चकनाचूर हुआ रजनीकांत का अहंकार: सुपरस्टार ने खुद सुनाया वो भावुक किस्सा!

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जब बेंगलुरु आश्रम में चकनाचूर हुआ रजनीकांत का अहंकार: सुपरस्टार ने खुद सुनाया वो भावुक किस्सा!
Rajinikanth ने सुनाया बेंगलुरु आश्रम से जुड़ा वो किस्सा, जिसने चूर-चूर कर दिया था उनके सुपरस्टार होने का अहंकार

जब ‘सुपरस्टार’ का अहंकार रूहानियत के सामने बौना पड़ गया: रजनीकांत ने सुनाया अपनी जिंदगी का सबसे प्रेरक किस्सा

मशहूर अभिनेता रजनीकांत ने हाल ही में बेंगलुरु स्थित ‘आर्ट ऑफ लिविंग इंटरनेशनल सेंटर’ की अपनी एक पुरानी यात्रा का बेहद दिलचस्प और गहरा किस्सा साझा किया। आश्रम की 45वीं वर्षगांठ और आध्यात्मिक गुरु श्री श्री रविशंकर के 70वें जन्मदिन के मौके पर उन्होंने बताया कि कैसे एक आध्यात्मिक अनुभव ने उनके ‘सुपरस्टार’ होने के अहंकार को पूरी तरह चकनाचूर कर दिया। रजनीकांत के अनुसार, हिमालय के बाद यह आश्रम ही उनके दिल के सबसे करीब है।

जब 2 दिन का प्रवास 15 दिनों के सुकून में बदल गया
रजनीकांत ने यादों के झरोखे से बताया कि जब वे पहली बार आश्रम पहुंचे, तो वहां की नैसर्गिक सुंदरता, चारों तरफ फैली हरियाली और लोगों के चेहरों पर तैरती मुस्कान ने उन्हें मंत्रमुग्ध कर दिया। वे वहां सिर्फ दो दिन बिताने के इरादे से गए थे, लेकिन वहां के अलौकिक माहौल ने उन्हें ऐसा बांधा कि वे 15 दिनों तक वहीं रुक गए। उन्होंने चुटकी लेते हुए यह भी साझा किया कि आश्रम में ‘रजनी’ नाम का एक घोड़ा भी था, जिसे सुनकर वहां मौजूद सभी लोग ठहाके लगाने लगे।

हैरान रह गए रजनीकांत: जब भीड़ ने सुपरस्टार को नहीं दी तवज्जो
अभिनेता ने एक ऐसी घटना का जिक्र किया, जिसने उन्हें जीवन का सबसे बड़ा पाठ पढ़ाया। उन्होंने बताया कि एक बार श्री श्री रविशंकर ने उन्हें अपने साथ दर्शन के लिए चलने को कहा। रजनीकांत मन ही मन आशंकित थे कि एक बड़ा स्टार होने के कारण लोग उन्हें घेर लेंगे और ऑटोग्राफ की होड़ मच जाएगी। वहां सैकड़ों लोग मौजूद थे, जिनमें से कई तमिलनाडु के भी थे। लेकिन रजनीकांत यह देखकर दंग रह गए कि किसी भी व्यक्ति ने उनकी मौजूदगी पर ध्यान तक नहीं दिया।

असली स्टारडम तो आध्यात्मिकता में है
रजनीकांत ने मंच से स्वीकार किया, ‘मैं लोगों को हाथ हिला रहा था, लेकिन कोई मुझे देख ही नहीं रहा था। सब अपनी ही भक्ति और साधना में लीन थे। इस अनुभव ने मेरे भीतर के अहंकार को खत्म कर दिया।’ उन्होंने बेहद संजीदगी से कहा कि फिल्मी स्टारडम अस्थाई है और वक्त के साथ धुंधला पड़ जाता है। असली और स्थायी स्टारडम केवल ‘आध्यात्मिकता’ में है, जो इंसान की मृत्यु के बाद भी बढ़ता रहता है। उन्होंने इस अनमोल सीख के लिए श्री श्री रविशंकर को ‘गुरुदेव’ कहकर अपना आभार व्यक्त किया।


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