माथे का चंदन या सिर की टोपी: आस्था की पहचान या कट्टरता की आग?

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चंदन-टीका से कुफी टोपी तक... धर्म की बढ़ती पहचान के बीच क्यों गहराता जा रहा है कट्टरता का सवाल?

चंदन-टीका, कुफी टोपी और रोजरी की गूंज के बीच आज भारतीय समाज एक नए चौराहे पर खड़ा है, जहाँ हर तरफ धर्म का माहौल और आस्था का ज्वार साफ दिखाई दे रहा है। कोई मंदिरों में शीश झुका रहा है, तो कोई मस्जिदों में इबादत कर रहा है, कोई गिरजाघरों की प्रार्थनाओं में लीन है तो कोई गुरुद्वारों की सेवा में जुटा है। हालांकि, यह सब पहले भी होता था, लेकिन आज इसकी आवृत्ति (फ्रीक्वेंसी) बेतहाशा बढ़ गई है। इस बढ़ते धार्मिक माहौल के साथ-साथ जिस तेजी से कट्टरता गहरी हो रही है, उसने हमारे ड्राइंग रूम और डिनर टेबल तक तीखी बहसों को जन्म दे दिया है। आज हर जुबान पर कुछ चुनिंदा और संवेदनशील सवाल तैर रहे हैं:

1. बीजेपी के शासन में मुसलमानों को दबाया जा रहा है और उनके अधिकारों पर हमले हो रहे हैं। 2. हिंदू हितों की बात करने वाला व्यक्ति सांप्रदायिक हो जाता है और मुसलमानों की पैरवी करने वाला ही सेक्युलर रहता है।

इन दो ज्वलंत सवालों की तह तक जाने के लिए पहले हमें यह समझना होगा कि आखिर ‘धर्म’ है क्या?

भारतीय संस्कृति में धर्म का वास्तविक अर्थ था- ‘वह जो धारण करने योग्य हो।’ इसमें व्यक्ति के निजी पूजा-पाठ से लेकर उसका संपूर्ण आचार-व्यवहार शामिल था। धर्म मूल रूप से इंसानों को एकसूत्र में पिरोने का एक माध्यम रहा है, जिसके उद्गम में सुरक्षा और भय की भावनाएं भी निहित थीं। आज के परिप्रेक्ष्य में देखें तो धर्म जीवन जीने की एक ऐसी शैली है, जो समाज को एकजुट रखती है। समाजशास्त्र धर्म को केवल व्यक्तिगत आस्था तक सीमित नहीं मानता, बल्कि इसे सामाजिक जीवन, सामूहिक विश्वासों और परंपराओं के ताने-बाने से जोड़कर देखता है। प्रसिद्ध फ्रांसीसी समाजशास्त्री एमिल दुर्खीम ने अपनी पुस्तक ‘The Elementary Forms of Religious Life’ में धर्म को सामाजिक एकता की धुरी बताया है। उनके अनुसार, जब लोग समान प्रतीकों, संस्कारों और आयोजनों में शिरकत करते हैं, तो उनके बीच सामूहिकता और अपनत्व का भाव परवान चढ़ता है।

आखिर क्यों सुलग रहा है धर्म के नाम पर समाज?

भारत जैसे विविधता से भरे बहुसांस्कृतिक देश में धार्मिक पहचान अक्सर राजनीतिक और सामाजिक बहस के केंद्र में आ जाती है। यदि कोई व्यक्ति अपनी आस्था, परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत पर गर्व महसूस करता है, तो इसे उसकी निजी पहचान और धार्मिक स्वतंत्रता का स्वाभाविक हिस्सा माना जाना चाहिए। इसी तरह, यदि कोई समुदाय अपने शैक्षिक संस्थानों, धार्मिक स्थलों या सांस्कृतिक अधिकारों के संरक्षण की मांग करे, तो यह एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में पूरी तरह जायज है। विडंबना यह है कि अक्सर ऐसी न्यायसंगत मांगों को भी धार्मिक कट्टरपंथ और सांप्रदायिकता के चश्मे से देखा जाने लगता है।

बीएचयू के लेक्चरर आदित्य खरे अवेयर मीडिया न्यूज़ से बातचीत में कहते हैं कि धर्म असल में वह है जिसे सहजता से धारण किया जा सके और समाजशास्त्र के मुताबिक यह समाज को जोड़ता व सुरक्षा का अहसास कराता है। उनके अनुसार, मूल रूप से किसी भी धर्म में कोई विवाद नहीं होता, बल्कि विवाद की जड़ वह कट्टरता है जिसे उसके पैरोकारों ने पैदा किया है। अपने धर्म को श्रेष्ठ और दूसरों के आचरण को हीन बताना ही कट्टरता है, जो समाज में नफरत का जहर घोलती है। साफ है कि विवाद धर्म से नहीं, बल्कि इसके नाम पर चलने वाले राजनीतिक एजेंडों से पैदा होता है।

कब और कैसे धार्मिक पहचान बन जाती है राजनीतिक हथियार?

जब धार्मिक पहचान सार्वजनिक जीवन और सत्ता के गलियारों में दाखिल होती है, तो उसके मायने पूरी तरह बदल जाते हैं। अपने अधिकारों और धार्मिक स्थलों की रक्षा की मांग करना किसी समुदाय की सामूहिक आवाज हो सकती है, लेकिन जब राजनीतिक दल और संगठन जनसमूह को लामबंद करने और अपने नापाक सियासी हितों को साधने के लिए इसका इस्तेमाल करते हैं, तब यह एक खतरनाक राजनीतिक मुद्दा बन जाता है।

‘Shikwa-e-Hind’ के लेखक और जामिया मिल्लिया इस्लामिया के प्रोफेसर मुजीबुर रहमान अवेयर मीडिया न्यूज़ को बताते हैं कि भारत में धार्मिक कट्टरता कोई नई परिघटना नहीं है, बल्कि 1980 के दशक से इसमें निरंतर उभार देखा जा रहा है। इसकी जड़ें औपनिवेशिक काल और देश के विभाजन के समय तक जाती हैं। विभाजन के बाद जब महात्मा गांधी और नेहरू जैसे दिग्गजों ने एक पंथनिरपेक्ष (सेक्युलर) भारत का संकल्प लिया था—जहाँ अल्पसंख्यकों के साथ कोई भेदभाव न हो—तब पाकिस्तान का निर्माण इस आशंका पर हुआ था कि बहुसंख्यक हिंदुओं के बीच मुसलमानों के साथ नाइंसाफी होगी। आज संविधान द्वारा दिए गए अधिकारों और धरातल पर दिखते माहौल में जो खाई नजर आती है, वह असल में एक ‘इंस्टीट्यूशनल फेल्योर’ (संस्थागत विफलता) का परिणाम है।

वह आगे कहते हैं कि सेक्युलरिज्म को आज ऐसे गढ़ा गया है मानो यह सिर्फ एक समुदाय विशेष की हिफाजत का कवच हो, जबकि इसकी असल रूह यह है कि यह हर धर्म के इंसान को सुरक्षा दे। कश्मीरी पंडितों के अधिकारों की रक्षा भी उतनी ही जरूरी है, लेकिन संवैधानिक नियमों के घोर उल्लंघन और राजनीतिक स्वार्थों के चलते ऐसा हो नहीं पा रहा है।

कार्ल मार्क्स ने धर्म को आर्थिक और सत्ता समीकरणों के आईने में देखते हुए यह समझाया था कि धार्मिक विचारों को सामाजिक परिस्थितियों से अलग करके नहीं परखा जा सकता। धर्म जहां एक ओर इंसानों को मानसिक संबल देता है, वहीं दूसरी ओर इसका इस्तेमाल असमानता और सत्ता के ढांचे को कायम रखने के लिए भी किया जाता है।

मार्क्स के इस दृष्टिकोण से यह समझना आसान हो जाता है कि कट्टरपंथ की ज़मीन आखिर तैयार कहाँ से होती है। हालाँकि, धार्मिक पहचान का राजनीति के दायरे में आना अपने आप में कट्टरपंथ का सबूत नहीं है। लोकतंत्र में हर समुदाय को अपनी आवाज उठाने और नीतियों पर राय रखने का हक है। समस्या तब पैदा होती है जब राजनीतिक मांगों के पीछे का मकसद दूसरों को कुचलना, नीचा दिखाना या हाशिए पर धकेलना बन जाता है। यहाँ यह परखना जरूरी है कि क्या कोई समूह केवल अपने अधिकारों की मांग कर रहा है या दूसरों के हक छीनने की नीयत रखता है? क्या रास्ता लोकतांत्रिक संवाद का है या फिर हिंसा, धमकी और नफरत का?

हमारा संविधान: धार्मिक स्वतंत्रता और समानता का बेहतरीन संतुलन

इन तमाम बहसों के बीच हमारा भारतीय संविधान हमें एक स्पष्ट मार्गदर्शिका प्रदान करता है। संविधान का अनुच्छेद 25 प्रत्येक नागरिक को अंतःकरण की स्वतंत्रता और अपने धर्म को मानने, आचरण करने तथा प्रचार करने की खुली छूट देता है। वहीं, अनुच्छेद 26 धार्मिक समुदायों को अपने मामलों के प्रबंधन का अधिकार सौंपता है। टकराव और विवाद की स्थिति तब पैदा होती है जब कोई एक पक्ष अपनी मान्यताओं को दूसरे पर थोपने का प्रयास करता है।


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