कुछ कहानियाँ समय के साथ धुंधली नहीं होतीं, बल्कि समय के साथ और गहरी हो जाती हैं। 1984 के सिख विरोधी दंगों का दर्द भी कुछ ऐसा ही है, जो कई पीढ़ियों के जेहन में आज भी ताजा है। ऐसे ही एक मामले में आज दिल्ली की राउज एवेन्यू कोर्ट से एक बड़ा फैसला आया है, जहाँ पूर्व कांग्रेस सांसद सज्जन कुमार (Sajjan Kumar) को जनकपुरी और विकासपुरी हिंसा मामले में बरी कर दिया गया।
कोर्ट ने यह फैसला ऐसे समय में सुनाया है जब पीड़ित परिवार चार दशकों से ‘इंसाफ’ की बाट जोह रहे थे। उनके लिए आज का दिन न्याय के मंदिर से एक और कानूनी झटके जैसा रहा।
सबूतों के अभाव में मिली राहत
दरअसल, यह मामला दशकों पुराना है, जिसकी जांच 2015 में गठित विशेष जांच टीम (SIT) ने नए सिरे से शुरू की थी। यह केस पश्चिमी दिल्ली के दो प्रमुख इलाकों में हुई हिंसा से जुड़ा था। 1 नवंबर 1984 को जनकपुरी में दो लोगों की बेरहमी से हत्या कर दी गई थी, तो वहीं 2 नवंबर 1984 को विकासपुरी में एक व्यक्ति को भीड़ ने कथित तौर पर जिंदा जला दिया था।
अभियोजन पक्ष का आरोप था कि इन घटनाओं के पीछे सज्जन कुमार का हाथ था और उन्होंने भीड़ को उकसाया था। लेकिन विशेष जज दिग विनय सिंह ने अपने फैसले में कहा कि रिकॉर्ड पर मौजूद सबूत सज्जन कुमार की संलिप्तता को संदेह से परे साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। कोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष अपने आरोपों को साबित करने में विफल रहा, जिसके चलते सज्जन कुमार को हत्या के आरोपों से मुक्त कर दिया गया।
पीड़ितों का दर्द और सुप्रीम कोर्ट की उम्मीद
अदालत के फैसले ने न केवल कानूनी गलियारों में हलचल मचा दी, बल्कि उन जख्मों को भी हरा कर दिया जो 40 साल बाद भी नहीं भरे हैं। फैसला सुनते ही अदालत परिसर में मौजूद पीड़ित परिवारों का सब्र टूट गया। एक पीड़ित ने आंखों में आंसू लिए कहा, "मैंने अपने परिवार के 10 लोगों को खोया है। क्या उन मासूमों की जान की कोई कीमत नहीं?"
पीड़ित परिवारों का आरोप है कि रसूखदार आरोपियों के खिलाफ गवाहों और सबूतों को समय के साथ कमजोर कर दिया गया। हालांकि, इस हार को मानने के बजाय पीड़ित परिवारों ने अब देश की सबसे बड़ी अदालत का दरवाजा खटखटाने का फैसला किया है। उनके कानूनी सलाहकारों ने स्पष्ट किया है कि वे इस आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील करेंगे। पीड़ितों का कहना है कि वे तब तक चैन से नहीं बैठेंगे जब तक सज्जन कुमार को उनके किए की सजा नहीं मिल जाती। देखना यह होगा कि सुप्रीम कोर्ट की तिराहे पर इन पीड़ितों को कब इंसाफ मिलता है।
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