यमुना तट पर आस्था का संगम: धीरेंद्र शास्त्री और कुमार विश्वास ने की पूजा, ‘सनातन हिंदू एकता पदयात्रा’ का किया ऐलान
उत्तरकाशी के मनमोहक बड़कोट में, यमुना नदी के निर्मल तट पर एक अभूतपूर्व आध्यात्मिक मिलन हुआ। बागेश्वर धाम सरकार के प्रमुख आचार्य धीरेंद्र शास्त्री, जिन्हें धीरेंद्र शास्त्री के नाम से भी जाना जाता है, ने प्रसिद्ध कवि कुमार विश्वास के साथ मिलकर मां यमुना की पूजा-अर्चना की। इस पावन अवसर पर, जहाँ प्रकृति की गोद में आध्यात्मिकता अपने चरम पर थी, वहीं आचार्य शास्त्री ने यमुना की पवित्रता पर चिंता व्यक्त करते हुए एक विशाल ‘सनातन हिंदू एकता पदयात्रा’ की घोषणा कर सभी को चौंका दिया।
मां यमुना की शुद्धता पर चिंता की लहर
यमुना नदी के किनारे विधिवत पूजा-अर्चना के उपरांत, आचार्य धीरेंद्र शास्त्री ने नदी के जल की अविश्वसनीय शुद्धता को देखकर आश्चर्य व्यक्त किया। ब्रज क्षेत्र और दिल्ली (इंद्रप्रस्थ) जैसे महत्वपूर्ण स्थानों पर इसके प्रदूषित स्वरूप को देखकर उन्होंने गहरी पीड़ा जताई। “यहां, मां यमुना का जल सोने के समान अत्यंत शुद्ध है,” आचार्य शास्त्री ने भावुक होकर कहा। “मां यमुना का यह रूप देखकर, मुझे आश्चर्य होता है कि ऐसी पवित्रता ब्रज क्षेत्र और दिल्ली में क्यों नहीं मिलती। यह देखकर मेरा दिल बैठ गया।” इस दृश्य ने उन्हें यमुना को उसके मूल, पवित्र स्वरूप में वापस लाने के लिए हर संभव प्रयास करने का संकल्प लेने के लिए प्रेरित किया।
‘सनातन हिंदू एकता पदयात्रा’: हिंदुओं को एकजुट करने की पुकार
आध्यात्मिक गुरु धीरेंद्र शास्त्री ने इस पावन अवसर पर एक महत्वपूर्ण घोषणा की – हिंदुओं को एकजुट करने के उद्देश्य से एक भव्य ‘सनातन हिंदू एकता पदयात्रा’ का आयोजन। यह यात्रा 7 नवंबर से आरंभ होकर 16 नवंबर तक चलेगी, जिसका मार्ग दिल्ली से वृंदावन तक तय किया गया है। इस पदयात्रा का प्राथमिक लक्ष्य सभी हिंदुओं को एक मंच पर लाना और ‘सनातनियों’ को संगठित करना है। आचार्य शास्त्री ने अपने संबोधन में दृढ़ता से कहा, “इस देश में कोई ‘तनातनी’ नहीं होगी, सिर्फ ‘सनातनी’ होंगे।”
अपने उद्बोधन में, आचार्य धीरेंद्र शास्त्री ने राजनीतिक और धार्मिक परिप्रेक्ष्य में कुछ तीखे बयान भी दिए। उन्होंने कहा, “इस देश में कोई ‘गजवा-ए-हिंद’ नहीं होगा, सिर्फ ‘भगवा-ए-हिंद’ होगा। राम का साथ देने वालों की जयकार होगी, राम का विरोध करने वालों की नहीं।” यह बयान हिंदुत्व के प्रति उनके दृढ़ समर्पण और राष्ट्र में ‘सनातन’ के प्रभुत्व की उनकी आकांक्षा को दर्शाता है।
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