बिहार में कांग्रेस की CWC बैठक: एक नया अध्याय

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सीडब्ल्यूसी की बैठक

85 साल बाद पटना में कांग्रेस की महाबैठक: बिहार में नई सियासी बिसात बिछाने की कवायद

पटना: 1940 में अविभाजित बिहार के रामगढ़ में कांग्रेस कार्यसमिति (सीडब्ल्यूसी) की ऐतिहासिक बैठक के करीब 85 साल बाद, बुधवार को कांग्रेस के दिग्गज एक बार फिर बिहार की राजधानी पटना में एकजुट हुए। यह मिलन महज एक औपचारिकgatherig नहीं था, बल्कि आने वाले विधानसभा चुनावों के मद्देनजर इसके गहरे सियासी मायने थे। महज दो महीने बाद राज्य में विधानसभा चुनाव होने हैं, और इस बैठक के जरिए कांग्रेस अपनी सांगठनिक ताकत का प्रदर्शन कर, महागठबंधन में सीटों के बंटवारे के मामले में अपनी मोलभाव की शक्ति को बढ़ाना चाहती है।

बिहार, कांग्रेस के लिए पिछले कुछ वर्षों में एक ऐसा राज्य रहा है जहाँ पार्टी का प्रदर्शन लगातार गिरता गया है। लगभग 35 वर्षों से सत्ता से दूर, पार्टी हाल के चुनावों में अपने मुख्य सहयोगी दल राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के सहारे ही आगे बढ़ पा रही थी। पटना में सीडब्ल्यूसी की यह बैठक न केवल प्रतिद्वंद्वियों के सामने शक्ति प्रदर्शन का मंच बनी, बल्कि राजद जैसे सहयोगी दलों को भी अपनी सियासी स्थिति का एहसास कराने का प्रयास था। राहुल गांधी की 1,300 किलोमीटर लंबी ‘वोटर अधिकार यात्रा’ से मिले आत्मविश्वास ने कांग्रेस को अब परोक्ष रूप से अपने ‘अधिकार’ की बात कहने का हौसला दिया है।

हैदराबाद फॉर्मूले की आस: क्या बिहार में भी खिलेगा कांग्रेस का कमल?

यह साफ है कि कांग्रेस बिहार में ‘हैदराबाद फॉर्मूले’ को आजमाने की जुगत में है। उन्हें उम्मीद है कि तेलंगाना में जिस तरह विधानसभा चुनाव से ठीक पहले 16 सितंबर, 2023 को हुई सीडब्ल्यूसी की बैठक ने कार्यकर्ताओं में नया जोश भरा और पार्टी को दक्षिणी राज्य में जीत दिलाई, वही जादू बिहार में भी चलेगा। हालांकि, इस पूरी कवायद में एक अहम पेच यह भी है कि कांग्रेस ने अभी तक तेजस्वी यादव को महागठबंधन का मुख्यमंत्री चेहरा घोषित नहीं किया है। इसे सीट बंटवारे की बातचीत में दबाव बनाने की एक चाल के तौर पर देखा जा रहा है। लेकिन, बिहार जैसे जटिल राजनीतिक परिदृश्य में कांग्रेस के लिए राह उतनी आसान भी नहीं है जितनी ऊपर से नजर आ रही है।

‘वोटर अधिकार यात्रा’ का उत्साह: वोटों में तब्दील होगा?

राहुल गांधी की ‘वोटर अधिकार यात्रा’ ने बेशक भीड़ जुटाने और सुर्खियां बटोरने में सफलता पाई। इस यात्रा में महागठबंधन और इंडिया गठबंधन के कई प्रमुख नेता, जैसे तेजस्वी यादव, दीपंकर भट्टाचार्य, एमके स्टालिन, अखिलेश यादव आदि शामिल हुए और राहुल के तीखे भाषणों ने विरोधियों को भी प्रभावित किया। लेकिन, कांग्रेस की आंतरिक आकलन रिपोर्ट यह संकेत दे रही है कि इस यात्रा से उत्पन्न उत्साह का वोटों में तब्दील हो पाना एक बड़ी चुनौती है।

जमीनी हकीकत और संगठन की कमजोरी: राह में रोड़े

पार्टी के अंदरूनी सूत्रों का मानना है कि यह अभियान ऊपरी तौर पर भले ही प्रभावशाली लगे, लेकिन जमीनी स्तर पर इसका असर सीमित रहने की संभावना है। इसका एक मुख्य कारण ‘मताधिकार’ के मुद्दे की जटिलता है। जिन लोगों के नाम वोटर लिस्ट में हैं, वे संतुष्ट हैं, जबकि जिनके नाम नहीं हैं, वे चुनाव को प्रभावित करने की स्थिति में नहीं हैं। इसके अलावा, कांग्रेस के संगठन का कमजोर नेटवर्क भी एक बड़ी समस्या है, जिसके चलते पार्टी को न केवल बिहार में, बल्कि देश भर में वोटों के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है।

तेजस्वी को सीएम चेहरा घोषित करने से परहेज़: गठबंधन में अनिश्चितता

तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित करने से कांग्रेस का परहेज़ पूरे महागठबंधन में अनिश्चितता का माहौल पैदा कर रहा है। तेजस्वी यह मानकर चल रहे हैं कि वही महागठबंधन के मुख्यमंत्री चेहरे होंगे। उनके करीबी सूत्रों के अनुसार, पूर्व डिप्टी सीएम को उम्मीद थी कि राहुल गांधी ‘वोटर अधिकार यात्रा’ के दौरान ही उन्हें आधिकारिक तौर पर यह घोषणा कर देंगे। हालांकि, कांग्रेस रणनीतिकारों का एक तबका मानता है कि जातिगत समीकरणों से भरे बिहार में चुनाव से पहले तेजस्वी को मुख्यमंत्री प्रत्याशी घोषित करना उल्टा पड़ सकता है। दूसरी ओर, राजद और लालू प्रसाद का परिवार इस मुद्दे पर अड़ा हुआ है, और इस खींचतान का फायदा निश्चित रूप से विरोधियों को मिल सकता है।

मुद्दों की निरंतरता का अभाव: ‘वोट चोरी’ पर फोकस, पर क्या यह काफी है?

कांग्रेस के समक्ष मुद्दों की निरंतरता को लेकर भी एक बड़ी समस्या है। मिसाल के तौर पर, पार्टी ने पिछले साल बिहार में जातिगत जनगणना और सामाजिक न्याय के मुद्दे को पुरजोर तरीके से उठाया था। इस मुद्दे को कार्यसमिति के प्रस्ताव में शामिल तो किया गया है, लेकिन अब राजनीतिक मुद्दा बनाने से पार्टी का यकायक पीछे हटना किसी को समझ नहीं आ रहा। कांग्रेस का पूरा जोर अब ‘वोट चोरी’ के मुद्दे पर है। पार्टी ने एक प्रस्ताव पारित कर इसे भाजपा की साजिश बताया है, जिसमें कहा गया है कि ‘वोट चोरी और मतदाता सूचियों में गड़बड़ी ने लोकतंत्र में जनता के भरोसे को हिला दिया है।’ हालांकि, एक मुद्दे को जोर-शोर से उठाकर फिर उस पर कदम पीछे खींच लेना, न अल्पावधि में और न दीर्घावधि में, एक अच्छी रणनीति मानी जा सकती है। इससे कांग्रेस को फायदे के बजाय नुकसान होने की अधिक संभावना है। वैसे भी, बिहार की राजनीति अन्य राज्यों की तुलना में काफी जटिल है, जहाँ जातिगत समीकरणों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता और इन्हें साधने के लिए अत्यधिक सूझबूझ की आवश्यकता होती है।

सदाकत आश्रम और बदलती सियासत: क्या कांग्रेस ने मुस्लिम वोटरों को खो दिया?

जिस सदाकत आश्रम में कांग्रेस की बैठक हुई, उसका एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक पहलू है। इसकी स्थापना गांधीजी के सहयोगी रहे मौलाना मजहरुल हक ने अपने दोस्त और स्वतंत्रता सेनानी खैरुन मियां द्वारा दान में दी गई जमीन पर की थी, जिसका उद्देश्य गांधीजी के सत्य और अहिंसा के सिद्धांतों को आगे बढ़ाना था। इसे भारतीय आजादी के आंदोलन में मुस्लिमों के सहयोगात्मक प्रतिनिधित्व का प्रतीक माना जा सकता है। लेकिन, बीते कुछ वर्षों में भारतीय राजनीति में मुस्लिमों के प्रतिनिधित्व में तेजी से गिरावट आई है, और कांग्रेस भी इस दिशा में कोई खास पहल करती या परवाह करती नजर नहीं आती। इसके चलते, जो मुस्लिम कभी कांग्रेस के स्वाभाविक वोटर हुआ करते थे, वे अब सपा और राजद जैसी पार्टियों की ओर खिसक गए हैं। यह स्थिति कांग्रेस के लिए, खासकर बिहार जैसे राज्य में जहाँ मुस्लिम मतदाता बड़ी संख्या में हैं, अपने पैर जमाने में मुश्किलें पैदा कर रही है।

(यह लेखक के निजी विचार हैं)


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