वंशवाद पर शशि थरूर का तीखा प्रहार: “भारतीय राजनीति एक पारिवारिक व्यवसाय”, योग्यतावाद की ओर बढ़ने का आह्वान
कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने भारत में “वंशवादी” राजनीति पर तीखा हमला बोलते हुए इसे लोकतंत्र के लिए “गंभीर खतरा” करार दिया है। प्रोजेक्ट सिंडिकेट पर ‘भारतीय राजनीति एक पारिवारिक व्यवसाय है’ शीर्षक से प्रकाशित अपने एक लेख में, थरूर ने इस प्रथा की कड़ी आलोचना करते हुए कहा है कि अब समय आ गया है कि देश योग्यतावाद की ओर बढ़े, जहाँ नेतृत्व का फैसला जन्म या पारिवारिक संबंधों से नहीं, बल्कि क्षमता और योग्यता के आधार पर हो।
नेहरू-गांधी परिवार से लेकर क्षेत्रीय दलों तक, वंशवाद का बोलबाला
थरूर के अनुसार, यह विचार कि भारतीय राजनीति में नेतृत्व एक “जन्मसिद्ध अधिकार” हो सकता है, भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू से लेकर इंदिरा गांधी और राजीव गांधी, और वर्तमान नेताओं राहुल गांधी व प्रियंका गांधी वाड्रा तक, इस परिवार के माध्यम से मजबूत हुआ है। उन्होंने कांग्रेस पर सीधा प्रहार करते हुए कहा है कि दशकों से एक परिवार ने भारतीय राजनीति पर अपनी अमिट छाप छोड़ी है।
यह आलोचना केवल कांग्रेस तक ही सीमित नहीं रही। थरूर ने अपने लेख में कांग्रेस के “इंडिया” ब्लॉक के सहयोगियों पर भी वंशवाद को बढ़ावा देने का आरोप लगाया है। उन्होंने शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे और उनके बेटे आदित्य ठाकरे, तथा समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव, जो पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के पुत्र हैं, का ज़िक्र किया। जम्मू-कश्मीर में अब्दुल्ला परिवार की तीन पीढ़ियों का भी उन्होंने उदाहरण दिया। तमिलनाडु में, मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन को दिवंगत मुख्यमंत्री एम. करुणानिधि का बेटा बताते हुए, उन्होंने कहा कि यह परिवार द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) पार्टी को “नियंत्रित” करता है।
एनडीए भी अछूता नहीं
थरूर ने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के भीतर भी वंशवाद के उदाहरण गिनाए। उन्होंने लोक जनशक्ति पार्टी के नेता रामविलास पासवान के निधन के बाद उनके बेटे चिराग पासवान द्वारा पदभार संभालने का उल्लेख किया। इसी तरह, उन्होंने बिजयानंद (बीजू) पटनायक के बेटे नवीन पटनायक का उदाहरण दिया, जिन्होंने अपने पिता की खाली सीट जीती और बाद में उन्हीं के नाम पर बीजू जनता दल की स्थापना कर ओडिशा के मुख्यमंत्री बने, और दो दशकों से अधिक समय तक इस पद पर रहे।
योग्यतावाद की ओर बढ़ने की पुकार
अपने लेख के माध्यम से, शशि थरूर ने भारतीय राजनीति में वंशवादी प्रथाओं की गहरी जड़ों और इसके लोकतंत्र पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभावों को रेखांकित किया है। उनका यह तीखा व्यंग्य और योग्यतावाद की ओर बढ़ने का आह्वान, देश की राजनीतिक व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन की आवश्यकता पर बल देता है, जहाँ हर नागरिक को अपनी प्रतिभा और क्षमता के दम पर आगे बढ़ने का अवसर मिले।
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