- वाशिंगटन से दिया गया ‘सिविलाइजेशनल फ्रेंडशिप’ का पैगाम
- लोकतांत्रिक ईरान का वादा: मूल्यों पर आधारित साझेदारी
- वैश्विक संकट और भारत की अहम भूमिका
- भारतीय तकनीक और नवीकरणीय ऊर्जा के मुरीद
- चाबहार और ‘पाकिस्तान परस्त’ रुख: ऐतिहासिक सच्चाई
- भारत-पाक युद्ध में मिला था पाकिस्तान का साथ
- रणनीतिक जोखिम: भारत के लिए अवसर या संकट?
- भारत की कनेक्टिविटी रणनीति पर संकट
- क्या बनेगा अमेरिका-ईरान-पाकिस्तान गठजोड़?
International
oi-Siddharth Purohit
Published: Saturday, January 17, 2026, 13:37 [IST]
Iran Protest: ईरान की सत्ता परिवर्तन की आग में, निर्वासित शाह रेजा पहलवी की भारत को ‘सभ्यतागत दोस्ती’ की न्योता
ईरान में सरकार-विरोधी हिंसक प्रदर्शनों की आग तेज होती जा रही है। इस राजनीतिक उथल-पुथल के बीच निर्वासित राजा रेजा पहलवी एक बार फिर सुर्खियों में हैं। पहलवी न केवल ईरान की सत्ता पर वापसी की कोशिशों में जुटे हैं, बल्कि उन्होंने भारत के साथ करीबी और सहयोगात्मक रिश्ते बनाने की भी वकालत की है। उनका कहना है कि यदि उनके नेतृत्व में एक लोकतांत्रिक ईरान बनता है, तो वह भारत और ईरान के बीच सदियों पुराने सभ्यतागत, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक संबंधों को सबसे पहले प्राथमिकता देंगे।
वाशिंगटन से दिया गया ‘सिविलाइजेशनल फ्रेंडशिप’ का पैगाम
वाशिंगटन में आयोजित एक संवाददाता सम्मेलन के दौरान रेजा पहलवी ने भारत-ईरान के गहरे रिश्तों को याद किया। उन्होंने जोर देकर कहा कि ये संबंध केवल आज की कूटनीति तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह हजारों वर्षों की साझा सांस्कृतिक विरासत है। उन्होंने कहा, “भारत और ईरान के संबंध बहुत पुराने हैं। यह सिर्फ आज की राजनीति की बात नहीं, बल्कि कई-कई सालों की सांस्कृतिक विरासत है।” उनका मानना है कि आधुनिक इतिहास में भी दोनों देशों के बीच रिश्ते काफी मजबूत रहे हैं।
लोकतांत्रिक ईरान का वादा: मूल्यों पर आधारित साझेदारी
रेजा पहलवी ने अपने बयान में स्पष्ट किया कि एक लोकतांत्रिक ईरान उन देशों के साथ मजबूत रिश्ते बनाएगा जो संप्रभुता, स्वतंत्रता और समान मूल्यों में विश्वास रखते हैं। उन्होंने कहा, “एक लोकतांत्रिक ईरान किसी भी ऐसे देश के साथ बेहतरीन संबंध बनाने के लिए तैयार रहेगा, जो हमारे साथ विभिन्न सेक्टर्स में साझेदारी कर सके।” इस बयान को भारत के लिए एक सकारात्मक संकेत के रूप में देखा जा रहा है, खासकर उन चिंताओं के बीच जो पश्चिम एशिया में सत्ता परिवर्तन को लेकर बनी हुई हैं।
वैश्विक संकट और भारत की अहम भूमिका
पहलवी ने माना कि आज दुनिया ऊर्जा संकट, जनसंख्या दबाव, जल संकट और संसाधनों की कमी जैसी गंभीर चुनौतियों से जूझ रही है। उनका मानना है कि इन समस्याओं से निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय सहयोग बेहद जरूरी है, और भारत इसमें एक अहम भूमिका निभा सकता है।
भारतीय तकनीक और नवीकरणीय ऊर्जा के मुरीद
भारत की तकनीकी ताकत की तारीफ करते हुए पहलवी ने कहा कि जब प्रौद्योगिकी और विशेषज्ञता की बात आती है, तो भारत दुनिया के अग्रणी देशों में शामिल है। उन्होंने माना कि भारत की तकनीकी क्षमता ईरान को कई अहम क्षेत्रों में आगे बढ़ने में मदद कर सकती है। उन्होंने नवीकरणीय ऊर्जा और उभरती तकनीकों में भारत-ईरान सहयोग की संभावना भी जताई।
चाबहार और ‘पाकिस्तान परस्त’ रुख: ऐतिहासिक सच्चाई
लेकिन, पहलवी का ‘लोकतांत्रिक और तकनीकी साझेदारी’ का प्रस्ताव कई ऐतिहासिक सवालों के घेरे में है। इतिहास गवाह है कि 1941 से 1979 तक ईरान के अंतिम शाह मोहम्मद रेजा पहलवी ने पाकिस्तान के साथ मजबूत सैन्य, आर्थिक और राजनयिक संबंध बनाए रखे थे। उस दौर में पाकिस्तान को ईरान की सुरक्षा और क्षेत्रीय प्रभाव के लिए एक बफर स्टेट माना जाता था।
भारत-पाक युद्ध में मिला था पाकिस्तान का साथ
शाह मोहम्मद रेजा पहलवी ने 1965 और 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्धों में खुले तौर पर पाकिस्तान का समर्थन किया था। उनके शासनकाल में ईरान ने कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान के रुख का समर्थन किया और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत के खिलाफ आक्रामक रुख अपनाया। यह ऐतिहासिक तथ्य वर्तमान परिदृश्य में भारत के लिए चिंता का विषय बना हुआ है।
रणनीतिक जोखिम: भारत के लिए अवसर या संकट?
रेजा पहलवी की संभावित वापसी भारत के लिए मिले-जुले संकेत लेकर आ रही है। एक तरफ यह तकनीकी और आर्थिक सहयोग के नए अवसर खोल सकती है, वहीं दूसरी ओर कुछ रणनीतिक जोखिम भी मौजूद हैं। खास चिंता इस बात को लेकर है कि पहलवी शासन एक बार फिर अमेरिका-समर्थित और हालात के मुताबिक पाकिस्तान-परस्त रुख अपना सकता है।
भारत की कनेक्टिविटी रणनीति पर संकट
चाबहार बंदरगाह को लेकर भी स्थिति असमंजस भरी है। भारत के लिए चाबहार सिर्फ एक बिजनेस प्रोजेक्ट नहीं, बल्कि उसकी कनेक्टिविटी रणनीति का अहम हिस्सा है। चाबहार के जरिए भारत, पाकिस्तान को दरकिनार कर अफगानिस्तान समेत मिडिल ईस्ट तक सीधी पहुंच बनाता है। भारत ने इस पोर्ट पर करोड़ों का निवेश किया है। हालांकि, पहलवी के पिता के कार्यकाल में भी ईरान ने पाकिस्तान को तरजीह दी थी। अब देखना होगा कि नया ईरान भारत के इस सामरिक हित को कितना प्राथमिकता देता है।
क्या बनेगा अमेरिका-ईरान-पाकिस्तान गठजोड़?
रेजा पहलवी की बहाली यदि पश्चिमी-समर्थित तख्तापलट के जरिए होती है, तो इससे क्षेत्रीय अस्थिरता बढ़ सकती है। विशेषज्ञों को आशंका है कि इससे अमेरिका-ईरान-पाकिस्तान का एक नया गठबंधन बन सकता है, जो भारत की रणनीतिक स्थिति और पश्चिम एशिया में उसके हितों को चुनौती दे सकता है। हालांकि, पहलवी खुद को एक लोकतांत्रिक बदलाव के नेता के रूप में पेश कर रहे हैं और भारत के आईटी और नवीकरणीय ऊर्जा सेक्टर की खुलकर तारीफ कर रहे हैं।
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English summary
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