प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस बार छत्तीसगढ़ के बस्तर में सुरक्षाबलों के जवानों के साथ बेहद खास अंदाज में दिवाली मनाई। इसी बीच, अपने संबोधन में उन्होंने एक बार फिर ‘दिमागी नक्सल’ का जिक्र कर सियासी गलियारों में हलचल बढ़ा दी है। पीएम के इस बयान पर समाजवादी पार्टी ने कड़ा रुख अपनाते हुए केंद्र सरकार की नीतियों पर तीखे सवाल खड़े किए हैं।
सपा प्रवक्ता फखरुल हसन चांद ने प्रधानमंत्री के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा, “जब से बीजेपी की सरकार सत्ता में आई है, तब से लगातार संवैधानिक संस्थाओं को कमजोर किया जा रहा है। चुनाव आयोग, सीबीआई और ईडी जैसी जांच एजेंसियों की निष्पक्षता पर गंभीर सवालिया निशान लग रहे हैं। आज देश का युवा और पूरा विपक्ष मिलकर हमारे लोकतंत्र को बचाने की बड़ी जिम्मेदारी निभा रहे हैं।” उन्होंने आगे तीखे शब्दों में कहा कि लोकतंत्र और आम जनता के हक की आवाज बुलंद करने वालों के लिए इस तरह की शब्दावली का इस्तेमाल करना बिल्कुल भी उचित नहीं है, और अधिकारों की यह लड़ाई आगे भी पूरी मजबूती से जारी रहेगी।
जंगलों से हथियारी नक्सली गए, पर दिमागी नक्सली बाकी
बस्तर में जवानों के बीच उत्सव मनाते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने गर्व के साथ देश को यह संदेश दिया कि अब भारत का हर एक जिला नक्सलवाद के अभिशाप से पूरी तरह मुक्त हो चुका है। इसी संदर्भ में उन्होंने ‘दिमागी नक्सलवाद’ पर करारा प्रहार करते हुए कहा, “भले ही जंगलों से हथियारबंद नक्सली विदा हो चुके हैं, लेकिन ये ‘दिमागी नक्सली’ अब भी मासूम बच्चों को गुमराह करने में लगे हैं। इन लोगों ने सुनियोजित तरीके से हमारी नई पीढ़ी के जेहन में घुसपैठ कर ली है।”
तीसरी बार दिया ‘दिमागी नक्सल’ वाला बयान
गौर करने वाली बात यह है कि प्रधानमंत्री मोदी ने पहली बार ‘दिमागी नक्सल’ शब्द का प्रयोग 15 अगस्त 2026 को लाल किले की प्राचीर से अपने स्वतंत्रता दिवस के संबोधन के दौरान किया था, जिस पर विपक्ष ने कड़ा ऐतराज जताया था। इसके बाद, 5 सितंबर को दिल्ली यूनिवर्सिटी के श्रीराम कॉलेज ऑफ कॉमर्स के शताब्दी समारोह में भी उन्होंने इसी बात को दोहराया था। अब बस्तर के जंगलों में जवानों के बीच अपने इस बयान को तीसरी बार दोहराए जाने के बाद देश का सियासी पारा एक बार फिर सातवें आसमान पर पहुंच गया है।
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