भारतीय राजनीति के शिखर पुरुष और देश के ‘लौह पुरुष’ कहे जाने वाले लाल कृष्ण आडवाणी आज 08 नवंबर को अपना 99वां जन्मदिन मना रहे हैं। स्वतंत्रता के बाद के दौर में विपक्ष की राजनीति से लेकर सत्ता के गलियारों तक का उनका सफर बेहद रोमांचक और प्रेरणादायक रहा है। वे भारतीय जनता पार्टी के उन मुख्य शिल्पकारों में शामिल हैं, जिन्होंने पार्टी को शून्य से शिखर तक पहुँचाया। आइए, उनके इस खास जन्मदिन पर जानते हैं उनके जीवन के अनछुए और दिलचस्प पहलुओं के बारे में…
जन्म और परिवार
पाकिस्तान के कराची शहर में 08 नवंबर 1927 को जन्मे लालकृष्ण आडवाणी के पिता का नाम किशनचंद डी आडवाणी और माता का नाम ज्ञानी देवी था। उनकी शुरुआती शिक्षा कराची के प्रतिष्ठित सेंट पैट्रिक हाई स्कूल से हुई। इसके बाद उन्होंने डीजी नेशनल कॉलेज और बॉम्बे के गवर्नमेंट लॉ कॉलेज से वकालत की डिग्री प्राप्त की। हालांकि, देश के ऐतिहासिक और विभाजन के उस दर्दनाक दौर में साल 1947 में उन्हें अपनी जन्मभूमि सिंध को छोड़कर भारत आना पड़ा था।
सामाजिक और राजनीतिक जीवन
श्री आडवाणी के सामाजिक और राजनीतिक जीवन का श्रीगणेश साल 1947 से हुआ। छात्र जीवन से ही वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के संपर्क में आ गए थे। साल 1947 में उन्होंने राजस्थान में संघ की गतिविधियों का जिम्मा संभाला। इसके बाद, जब साल 1951 में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने आरएसएस की राजनीतिक इकाई के रूप में ‘भारतीय जनसंघ’ की नींव रखी, तो आडवाणी जी को राजस्थान इकाई का सचिव बनाया गया। वे इस पद पर साल 1970 तक डटे रहे और फिर रुख किया देश की राजधानी दिल्ली का।
साल 1970 में वे देश की संसद के उच्च सदन यानी राज्यसभा के सदस्य बने और साल 1989 तक इस पद पर अपनी सेवाएं दीं। वर्ष 1973 में वे भारतीय जनसंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष चुने गए। देश में जब साल 1975 में आपातकाल (इमरजेंसी) की घोषणा हुई, तो उन्हें भी जेल की सलाखों के पीछे वक्त गुजारना पड़ा। साल 1980 में भारतीय जनता पार्टी (BJP) की स्थापना के बाद वे 1986 तक पार्टी के महासचिव रहे और फिर 1986 से 1991 तक पार्टी की कमान बतौर अध्यक्ष अपने हाथों में संभाली। आगे चलकर, बीजेपी के नेतृत्व वाले गठबंधन (NDA) की सरकारों में वे साल 1998 और 1999 में देश के केंद्रीय गृह मंत्री के रूप में भी देश की सेवा की।
भाजपा के शिल्पकार
इसके बाद का सफर और भी गौरवशाली रहा। साल 2002 में वे देश के उप-प्रधानमंत्री बने। साल 2004 के आम चुनावों में बीजेपी को हार मिलने के बाद उन्होंने लोकसभा में विपक्ष के नेता की भूमिका निभाई। अपने करीब तीन दशक लंबे शानदार संसदीय सफर और संगठन पर मजबूत पकड़ के बल पर उन्होंने ही बीजेपी को राष्ट्रीय स्तर पर खड़ा करने में सबसे अहम भूमिका निभाई। पार्टी के इन्हीं अतुलनीय योगदानों के चलते उन्हें कभी ‘पार्टी का कर्णधार’ तो कभी आधुनिक भारत का ‘लौह पुरुष’ कहा गया।
राम मंदिर आंदोलन
भारतीय राजनीति में आडवाणी का नाम आते ही राम मंदिर आंदोलन की गूंज स्वतः सुनाई देने लगती है। साल 1990 में उन्होंने इस आंदोलन को जन-जन तक पहुँचाने के लिए गुजरात के सोमनाथ से उत्तर प्रदेश के अयोध्या तक एक ऐतिहासिक ‘रथ यात्रा’ निकाली थी। इस दौरान उनकी गिरफ्तारी भी हुई, लेकिन इस कार्रवाई ने उनके राजनीतिक कद और जनसमर्थन को आसमान पर पहुँचा दिया, जिससे उनकी लोकप्रियता चरम पर पहुँच गई।
अपनी राजनीतिक यात्रा के अगले पड़ाव में वे साल 2009 के आम लोकसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी की तरफ से प्रधानमंत्री पद के आधिकारिक उम्मीदवार भी रहे। वर्ष 2014 से 2020 तक वे भाजपा के सर्वोच्च नीति-निर्धारण निकाय यानी संसदीय बोर्ड के सदस्य रहे। देश के लिए उनके इन महान और ऐतिहासिक योगदानों का सम्मान करते हुए साल 2024 में भारत सरकार ने उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ से अलंकृत किया।
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