भागवत का विजयदशमी संदेश: स्वदेशी, विविधता और राष्ट्र निर्माण पर जोर
नागपुर में विजयदशमी के शुभ अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने अपने उद्बोधन में कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर प्रकाश डाला। अमेरिका की नई टैरिफ नीति की आलोचना करते हुए उन्होंने वैश्विक निर्भरता के बीच स्वदेशी और आत्मनिर्भरता पर जोर दिया। भागवत ने कहा कि दुनिया आज वैश्विक चुनौतियों के समाधान के लिए भारत की ओर देख रही है, और भारत को अपनी अनूठी विविधता को बनाए रखते हुए दुनिया को रास्ता दिखाना चाहिए।
वैश्विक परिदृश्य और भारत की भूमिका
भागवत ने अमेरिका की टैरिफ नीति को उनके अपने हितों से प्रेरित बताया, लेकिन यह भी रेखांकित किया कि यह नीति वैश्विक स्तर पर सभी को प्रभावित करती है। उन्होंने दुनिया के एक-दूसरे पर निर्भर होने के सिद्धांत को समझाते हुए कहा कि कोई भी देश अलग-थलग नहीं रह सकता। यह निर्भरता मजबूरी में न बदले, इसके लिए उन्होंने स्वदेशी को अपनाने और आत्मनिर्भरता पर ध्यान केंद्रित करने का आह्वान किया। साथ ही, उन्होंने मित्र देशों के साथ स्वेच्छा से राजनयिक संबंध बनाए रखने की वकालत की।
विविधता का सम्मान और एकता का संदेश
आरएसएस प्रमुख ने भारत की असीम विविधता को देश की एक विशिष्ट पहचान बताया। उन्होंने चिंता व्यक्त की कि इस विविधता को भिन्नता में बदलने के प्रयास किए जा रहे हैं। भागवत ने विदेशी विचारधाराओं को अपनाने के भारत के ऐतिहासिक स्वभाव का उल्लेख करते हुए कहा कि हमें दुनिया की विविधता को स्वीकार करना चाहिए और अपने व्यवहार व शब्दों से किसी भी आस्था या विश्वास का अपमान नहीं करना चाहिए।
सामाजिक सद्भाव और कानून का शासन
समाज में विभिन्न मान्यताओं वाले लोगों के साथ रहने पर कुछ हद तक शोर-शराबा स्वाभाविक है, लेकिन भागवत ने जोर देकर कहा कि ऐसे समय में भी सद्भाव और कानून-व्यवस्था का उल्लंघन नहीं होना चाहिए। उन्होंने कानून को अपने हाथ में लेने, हिंसा और गुंडागर्दी का सहारा लेने को गलत ठहराया। किसी विशेष समुदाय को भड़काने और शक्ति प्रदर्शन को पूर्व नियोजित षड्यंत्र करार दिया।
राष्ट्र नायकों को श्रद्धांजलि
अपने भाषण में, मोहन भागवत ने महात्मा गांधी और लाल बहादुर शास्त्री को उनकी जयंती पर विशेष रूप से याद किया। उन्होंने महात्मा गांधी को स्वतंत्रता संग्राम के अग्रणी नेता और भारत के स्वत्व पर आधारित स्वतंत्रता के बाद के भारत के स्वप्नदृष्टा के रूप में सराहा। वहीं, लाल बहादुर शास्त्री को सादगी, विनम्रता, सत्यनिष्ठा और राष्ट्र के प्रति अदम्य समर्पण का प्रतीक बताते हुए उनके जीवन को राष्ट्र सेवा का अनुकरणीय उदाहरण बताया। भागवत ने कहा कि शास्त्री जी का जीवन हमें सिखाता है कि एक व्यक्ति कैसे सच्चे अर्थों में मानव बन सकता है और उसी के अनुरूप जीवन जी सकता है।
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