बिहार चुनाव से पहले ओवैसी का सीमांचल में आगाज: नए समीकरणों की तलाश में AIMIM
आगामी बिहार विधानसभा चुनावों के गरमाते माहौल के बीच, ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन (AIMIM) के प्रमुख और हैदराबाद के सांसद, असदुद्दीन ओवैसी, आज किशनगंज से अपने चुनावी अभियान का शंखनाद करेंगे। यह रणनीतिक कदम बिहार के महत्वपूर्ण सीमांचल क्षेत्र पर AIMIM के बढ़ते फोकस को दर्शाता है। ओवैसी ने अपने आधिकारिक एक्स (पूर्व में ट्विटर) हैंडल से अपने पांच दिवसीय विस्तृत कार्यक्रम की घोषणा करते हुए, क्षेत्र में विभिन्न सार्वजनिक कार्यक्रमों और रैलियों की रूपरेखा प्रस्तुत की। उनके शब्दों में नए गठबंधनों और राजनीतिक समीकरणों की आहट साफ सुनाई दे रही है।
नए रास्तों की तलाश: इंडिया गठबंधन से दूरी और सीमांचल पर दांव
ओवैसी के एक दिन पहले दिए बयान, "मैं कल किशनगंज पहुँचूँगा और 27 सितंबर तक बिहार के सीमांचल में रहूँगा, इंशाअल्लाह। मैं कई साथियों से मिलने और इंशाअल्लाह, कई नई दोस्ती बनाने के लिए उत्सुक हूँ," को इस बात का स्पष्ट संकेत माना जा रहा है कि इंडिया गठबंधन से कोई खास प्रतिक्रिया न मिलने के बाद, वे अब सीमांचल में ही क्षेत्रीय राजनीतिक साझेदारी की संभावनाएं तलाश रहे हैं। गौरतलब है कि डेढ़ महीने पहले, AIMIM के प्रदेश अध्यक्ष अख्तरुल ईमान ने ओवैसी के निर्देश पर इंडिया ब्लॉक के नेताओं को एक पत्र लिखकर सीमांचल के पिछड़ेपन और उपेक्षा पर चिंता व्यक्त की थी और आगामी चुनावों में एनडीए के खिलाफ एकजुट होने का आग्रह किया था। हालांकि, बिहार में मुख्य विपक्षी दल, खासकर राष्ट्रीय जनता दल (राजद) की ओर से इस पर कोई खास प्रतिक्रिया नहीं आई।
सीमांचल: AIMIM के लिए उपजाऊ जमीन?
ओवैसी के अभियान से पहले, AIMIM की बिहार इकाई ने राज्य भर में, विशेषकर सीमांचल में, अपने समर्थकों और कार्यकर्ताओं से क्षेत्र के लोगों के हक की लड़ाई में सक्रिय रूप से भाग लेने की अपील की है। सीमांचल, जिसमें किशनगंज, अररिया, पूर्णिया और कटिहार जैसे चार मुस्लिम-बहुल जिले शामिल हैं, AIMIM के लिए राजनीतिक रूप से बेहद अनुकूल क्षेत्र बनकर उभरा है। यह जनसांख्यिकी इस क्षेत्र को AIMIM के लिए अपनी उपस्थिति मजबूत करने और राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को पंख देने का एक ‘उपजाऊ ज़मीन’ प्रदान करती है।
राजद के गढ़ में AIMIM की सेंध: बदलता सियासी परिदृश्य
परंपरागत रूप से, सीमांचल राजद का गढ़ रहा है, जहाँ कभी पूर्व सांसद तस्लीमुद्दीन का दबदबा था। तस्लीमुद्दीन के निधन के बाद राजद का प्रभाव धीरे-धीरे कम हुआ है, लेकिन उसका एक महत्वपूर्ण आधार अभी भी कायम है। ऐसे में, सीमांचल की राजनीति में AIMIM का प्रवेश निस्संदेह राजद के लिए एक कड़ी चुनौती पेश कर रहा है और इस क्षेत्र के राजनीतिक परिदृश्य को और अधिक प्रतिस्पर्धी बना रहा है।
2020 का इतिहास और 2025 की उम्मीदें
2020 के बिहार विधानसभा चुनावों में AIMIM ने सीमांचल में पांच सीटें जीतकर अपनी मजबूत चुनावी शुरुआत की थी। हालांकि, 2022 में पार्टी के चारों विधायक राजद में शामिल हो गए, जिससे राज्य में पार्टी की पकड़ कमजोर हुई। इस झटके के बावजूद, AIMIM 2025 के चुनावों से पहले महागठबंधन में शामिल होने की इच्छा व्यक्त कर चुका है, ताकि धर्मनिरपेक्ष वोटों का बिखराव रोका जा सके। यह प्रयास अभी तक सफल नहीं हुआ है, लेकिन ओवैसी का सीमांचल दौरा यह दर्शाता है कि पार्टी अपनी रणनीतियों में नयापन लाते हुए, नए गठबंधनों और राजनीतिक समीकरणों की तलाश में जुटी है।
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