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मुकुल रॉय की अयोग्यता पर सुप्रीम कोर्ट की रोक, राजनीतिक संग्राम अब शीर्ष अदालत में
पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक बड़े राजनीतिक उलटफेर पर सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम रोक लगा दी है। कोलकाता हाई कोर्ट द्वारा मुकुल रॉय को विधानसभा सदस्य के पद से अयोग्य घोषित करने के आदेश पर सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल रोक लगा दी है। इस फैसले ने राज्य की सियासत में एक नई बहस छेड़ दी है।
मामले की सुनवाई भारत के मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति जे बी पारदीवाला की पीठ ने की। पीठ ने मई में यह अंतरिम आदेश पारित किया, ठीक उस समय जब राज्य की विधानसभा का कार्यकाल समाप्त होने वाला था और आगामी राज्य चुनावों से कुछ ही महीने पहले थे।
क्या है पूरा मामला?
मुकुल रॉय 2021 में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के टिकट पर विधायक चुने गए थे, लेकिन बाद में वे सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) में वापस लौट आए। इसी "दल-बदल" के आधार पर भाजपा नेताओं सुवेंदु अधिकारी और अंबिका रॉय ने कलकत्ता हाई कोर्ट में याचिका दायर कर उन्हें अयोग्य घोषित करने की मांग की थी।
इससे पहले, पश्चिम बंगाल विधानसभा के अध्यक्ष बिमान बनर्जी ने जून 2022 में इस अयोग्यता याचिका को खारिज कर दिया था, जिसे बाद में हाई कोर्ट ने पलट दिया था। हाई कोर्ट के इसी आदेश के खिलाफ मुकुल रॉय के बेटे सुभ्रांशु रॉय ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।
सुप्रीम कोर्ट में क्या हुई दलीलें?
सुप्रीम कोर्ट में सुभ्रांशु रॉय की ओर से पेश वकील प्रीतिका द्विवेदी ने तर्क दिया कि हाई कोर्ट ने दल-बदल विरोधी कानून (संविधान की दसवीं अनुसूची) के तहत अयोग्यता का फैसला करने के लिए इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य के प्रमाणीकरण की जरूरत को नजरअंदाज कर दिया। उनका कहना था कि विधानसभा अध्यक्ष ने भी इसी आधार पर मुकुल रॉय की अयोग्यता वाली याचिका खारिज की थी।
दूसरी ओर, भाजपा नेताओं की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता गौरव अग्रवाल ने कोर्ट को बताया कि मुकुल रॉय ने भाजपा टिकट पर चुनाव जीतने के बाद दल-बदल किया और इसलिए विधायक के पद पर बने रहने के हकदार नहीं हैं।
कोर्ट की चिंता: एआई के युग में साक्ष्यों की प्रामाणिकता
सुप्रीम कोर्ट ने मामले की गहराई से सुनवाई करते हुए अप्रमाणित इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों की विश्वसनीयता पर गंभीर चिंता जताई। पीठ ने कहा कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) के युग में, ऐसे साक्ष्यों की प्रामाणिकता की जांच करना बेहद जरूरी है, जिसकी पुष्टि साक्ष्य अधिनियम की धारा 65बी के तहत की गई हो।
आगे क्या होगा?
सुप्रीम कोर्ट ने विधानसभा अध्यक्ष बिमान बनर्जी, सुवेंदु अधिकारी और अंबिका रॉय को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। अदालत ने निर्देश दिया है कि चार सप्ताह के भीतर जवाभी हलफनामा दाखिल किया जाए, जिसके बाद दो सप्ताह के भीतर प्रतिउत्तर दाखिल किया जा सकेगा। इस मामले की अगली सुनवाई तय होने तक मुकुल रॉय फिलहाल विधायक बने रहेंगे।
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