कोलकाता में महा नवमी 2025: दुर्गा पूजा का भव्य उत्सव, आस्था और संस्कृति का संगम
कोलकाता: पश्चिम बंगाल की पावन धरती पर दुर्गा पूजा सिर्फ एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सदियों से चली आ रही सांस्कृतिक विरासत और जन-जन की भावनाओं का प्रतीक है। विशेष रूप से कोलकाता में दुर्गा पूजा का उल्लास पूरे विश्व में अपनी अनूठी छटा बिखेरता है।
महानवमी: दुर्गा पूजा का चरम
वर्ष 2025 में, महानवमी का पावन पर्व 1 अक्टूबर 2025 (बुधवार) को मनाया जा रहा है। यह वो शुभ दिन है जब दुर्गा पूजा अपने शबाब पर होती है, और देवी दुर्गा की महिमा का उत्सव, बंगाल के साथ-साथ देश-विदेश के भक्तों को भी अपनी ओर आकर्षित करता है।
महानवमी का धार्मिक महत्व
नवरात्रि के नौवें दिन को महानवमी के नाम से जाना जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इसी शुभ घड़ी में मां दुर्गा ने महापराक्रमी महिषासुर का वध कर धर्म की स्थापना की और संसार को उसके आतंक से मुक्ति दिलाई। बंगाल में यह दिन विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसे शक्ति की विजय और भक्तों की अटूट आस्था के चरम का प्रतीक माना जाता है। महानवमी के पावन अवसर पर, श्रद्धालु मां दुर्गा के महिषासुरमर्दिनी रूप की विशेष पूजा-अर्चना करते हैं।
कोलकाता की दुर्गा पूजा: एक विश्व स्तरीय आकर्षण
कोलकाता की दुर्गा पूजा की भव्यता विश्वव्यापी है। इसी असाधारण सांस्कृतिक महत्व को पहचानते हुए, यूनेस्को ने 2021 में इसे ‘Intangible Cultural Heritage’ (अमूर्त सांस्कृतिक विरासत) की उपाधि से सम्मानित किया है। शहर का हर कोना सजे हुए पंडालों, मनमोहक लाइटिंग, थीम-आधारित मूर्तियों और पारंपरिक नृत्य-संगीत से जीवंत हो उठता है। महानवमी के दिन, पंडालों में भक्तों का सैलाब उमड़ पड़ता है और पूरा शहर मां दुर्गा के जयकारों से गूंज उठता है।
कोलकाता का कुम्हारटोली, जो मूर्तिकारों का गढ़ है, महीनों पहले से ही मां शक्ति की अद्भुत मूर्तियों के निर्माण में जुट जाता है। हर पंडाल की अपनी एक अनूठी थीम होती है – कहीं ऐतिहासिक विरासत को दर्शाया जाता है, तो कहीं आधुनिक कला और सामाजिक संदेशों को जीवंत किया जाता है। महानवमी के दिन, इन पंडालों की रौनक देखने लायक होती है।
अष्टमी और नवमी की विशेष पूजा
महानवमी के दिन, भक्त विशेष ‘महापूजा’ और ‘हवन’ करते हैं। बंगाल की परंपरा के अनुसार, नवमी की पूजा में प्रतीकात्मक बलि (जहाँ प्रचलित हो) और विशेष भोग का आयोजन किया जाता है। विशेष रूप से, खिचड़ी, लड्डू, खीर और मौसमी फल मां को अर्पित किए जाते हैं, और फिर श्रद्धालुओं में प्रसाद के रूप में वितरित किए जाते हैं। इसी दिन ‘संधि पूजा’ भी की जाती है, जिसमें अष्टमी और नवमी के संधि काल में विशेष आराधना की जाती है।
सांस्कृतिक कार्यक्रमों का उल्लास
महानवमी के अवसर पर, कोलकाता में धार्मिकता के साथ-साथ सांस्कृतिक रंग भी खूब देखने को मिलते हैं। ढाक की थाप, धुनुची नृत्य, शंखनाद और पारंपरिक लोकगीत इस पर्व की आत्मा हैं। महिलाएं पारंपरिक लाल-पड़िया साड़ी पहनकर मां दुर्गा की आराधना करती हैं और धुनुची नृत्य से वातावरण को भक्तिमय बना देती हैं। पुरुष ढाक बजाकर इस उत्सव के माहौल को और भी जीवंत बना देते हैं।
सामाजिक एकता और भाईचारे का प्रतीक
महानवमी और दुर्गा पूजा केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक एकता का भी जीवंत प्रतीक है। इस अवसर पर, हर धर्म और समुदाय के लोग एक साथ पंडालों में पहुंचकर मां दुर्गा के दर्शन करते हैं। कोलकाता की गलियां रोशनी से जगमगा उठती हैं और चारों ओर उत्सव का उल्लास छा जाता है।
इस बार, दुर्गा पूजा के अवसर पर कोलकाता का दृश्य अलौकिक है। लाखों श्रद्धालु मां दुर्गा के दर्शन के लिए उमड़े हैं, पंडालों की रौनक और ढाक की गूंज से पूरा वातावरण भक्तिमय हो गया है। यह पर्व न केवल आस्था और श्रद्धा का प्रतीक है, बल्कि बंगाल की समृद्ध संस्कृति और गौरवशाली विरासत को भी दुनिया के सामने प्रस्तुत करता है।
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