लेखन का मायावी ताना-बाना: शिवमूर्ति की रचन-यात्रा का रहस्योद्घाटन
लेखन की प्रक्रिया, एक ऐसा रहस्यमय संसार है जिसे शब्दों में पिरो पाना अत्यंत दुष्कर है। प्रसिद्ध कथाकार शिवमूर्ति अपनी अनूठी रचन-प्रक्रिया का उद्घाटन करते हुए बताते हैं कि हर रचनाकार का अपना एक विशिष्ट मार्ग होता है। यह मार्ग अनगिनत यात्राओं, देखे-सुने दृश्यों, और संचित अनुभवों का एक ऐसा संगम है, जो धीरे-धीरे एक मनोहारी रचना का रूप धारण करता है। जब शिवमूर्ति लिखने बैठते हैं, तो उनका मस्तिष्क स्वतः ही उन यादों और अनुभवों को बुनना शुरू कर देता है। वे अपने अनुभवों को एक ‘कबाड़खाने’ की भांति संजोते जाते हैं, और जब इन बिखरे हुए मोतियों को पिरोते हैं, तो एक उत्कृष्ट रचना का जन्म होता है। इस पूरी प्रक्रिया में, शिवमूर्ति स्वयं को एक सूत्रधार के रूप में देखते हैं, जो प्रकृति द्वारा प्रदत्त तत्वों को खूबसूरती से जोड़ता है। उनकी रचना का मूल मंत्र है – कहानी की व्यावहारिकता और उसकी पठनीयता पर गहन ध्यान।
इस परिचर्चा में, रविकांत ने शिवमूर्ति की साहित्यिक देन को रेखांकित करते हुए कहा कि उनकी किसी भी कृति में लोक-रंग की महक के बिना कोई भी रचना अधूरी है। हर कहानी अपने समय और समाज की सजीव धड़कन को महसूस कराती है। चंदन पाण्डेय ने इस बात पर जोर दिया कि शिवमूर्ति ने यथार्थवादी पात्रों को इतनी गहराई से उकेरा है कि वे हमारी सामूहिक स्मृति का अविभाज्य अंग बन गए हैं। उनका साहित्य, जहाँ एक ओर संवैधानिक नैतिकता को प्रस्तुत करता है, वहीं दूसरी ओर सामाजिक नैतिकता के जटिल द्वंद्व को भी बड़ी कुशलता से दर्शाता है। जीवन की कटु सच्चाइयों को उन्होंने जिस सरलता और करुणा भाव से चित्रित किया है, वह उन्हें अपने युग का एक अत्यंत मानवीय लेखक स्थापित करता है।
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