अहोई अष्टमी: संतान की रक्षा और दीर्घायु का पावन पर्व
करवा चौथ के चार दिन बाद और दीवाली से ठीक एक सप्ताह पहले, भारत में हिन्दू समुदाय ‘अहोई अष्टमी’ का एक महत्वपूर्ण पर्व मनाता है। यह व्रत मुख्य रूप से संतान वाली महिलाएं करती हैं, लेकिन आज के समय में निसंतान महिलाएं भी संतान प्राप्ति की कामना से इसे रखती हैं। प्रत्येक वर्ष कार्तिक कृष्ण अष्टमी को मनाया जाने वाला यह पर्व इस वर्ष 13 अक्टूबर को है।
इस व्रत के दौरान, महिलाएं दिन भर उपवास रखती हैं। शाम होते ही, दीवार पर आठ कोष्ठकों वाली अहोई की पुतली चित्रित की जाती है, जिसके पास सेई (हेजल) और उसके बच्चों के चित्र भी बनाए जाते हैं। भूमि पर सुंदर चौक पूरकर कलश स्थापित किया जाता है। कलश पूजन के बाद, दीवार पर बनाई गई अहोई का पूजन किया जाता है। इसके उपरांत, दूध-भात का भोग लगाकर कथा कही जाती है। आधुनिकता के इस दौर में, कई महिलाएं दीवारों पर चित्र बनाने के बजाय बाजार से तैयार अहोई के चित्र खरीदकर उन्हें पूजा स्थल पर स्थापित कर पूजन करती हैं। कार्तिक कृष्ण अष्टमी को यह व्रत महिलाओं द्वारा अपनी संतानों की लंबी आयु और जीवन के सभी कष्टों व बाधाओं से उनकी रक्षा के लिए रखा जाता है। कुछ स्थानों पर इस दिन ‘धोबी मारन लीला’ का भी मंचन होता है, जिसमें भगवान श्रीकृष्ण द्वारा कंस के भेजे गए धोबी का वध करते हुए दर्शाया जाता है। अपनी-अपनी पारिवारिक परंपराओं के अनुसार, लोग अहोई माता के रूप में माता पार्वती की पूजा करते हैं।
अहोई अष्टमी व्रत से जुड़ी कथाएं
अहोई अष्टमी व्रत के संबंध में कई कथाएं प्रचलित हैं। एक प्रमुख कथा के अनुसार, प्राचीन काल में एक नगर में एक साहूकार रहता था जिसके सात पुत्र थे। दीपावली से कुछ समय पूर्व, साहूकार की पत्नी मिट्टी लेने खदान में गई। वहां उसने कुदाल से मिट्टी खोदना शुरू किया, तभी संयोगवश उसकी कुदाल से एक सेह के बच्चे को चोट लग गई, जिससे उसकी मृत्यु हो गई। अपनी अनजाने में हुई हत्या से साहूकार की पत्नी को बहुत दुख हुआ। वह पश्चाताप करती हुई घर लौटी। कुछ दिनों बाद, उसके एक पुत्र का निधन हो गया। इसके बाद, एक-एक करके उसके सभी सातों पुत्रों की मृत्यु वर्ष भर में हो गई।
अत्यंत व्यथित महिला ने एक दिन अपनी पड़ोस की महिलाओं को अपना दुख सुनाया। उसने बताया कि उसने जानबूझकर कोई पाप नहीं किया, सिवाय उस एक बार अनजाने में सेह के बच्चे को चोट पहुँचाने के। यह सुनकर, पड़ोस की वृद्ध महिलाओं ने उसे सांत्वना दी और कहा कि अपने पश्चाताप से उसने अपना आधा पाप धो लिया है। उन्होंने सलाह दी कि जिस अष्टमी को यह घटना हुई थी, उस दिन भगवती माता की शरण लें, सेह और उसके बच्चों का चित्र बनाएं, उनकी आराधना करें और क्षमा याचना करें। ईश्वर की कृपा से उसका पाप अवश्य दूर हो जाएगा। साहूकार की पत्नी ने वृद्ध महिलाओं की बात मान ली और कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को उपवास रखकर अहोई माता की पूजा-अर्चना की। वह हर वर्ष नियमित रूप से ऐसा करती रही। समय के साथ, उसे सात पुत्रों की प्राप्ति हुई। तभी से अहोई व्रत की परंपरा चली आ रही है।
एक और कथा
अहोई व्रत से संबंधित एक अन्य कथा झांसी के निकट एक नगर की है। वहां चन्द्रभान नामक एक साहूकार रहता था। उसकी पत्नी चन्द्रिका सुंदर, सर्वगुण संपन्न, सती-साध्वी और चरित्रवान थी। उनके कई पुत्र-पुत्रियां थे, परंतु सभी बाल्यावस्था में ही मृत्यु को प्राप्त हो चुके थे। संतान न होने से दोनों पति-पत्नी अत्यंत दुखी थे। वे अक्सर सोचते कि उनके बाद उनकी अपार धन-संपदा का वारिस कौन होगा। अंततः, उन्होंने शेष जीवन प्रभु-भक्ति में व्यतीत करने का निर्णय लिया और वनवास हेतु घर-बार त्याग दिया।
वे यात्रा करते-करते बद्रिका आश्रम के निकट शीतल कुंड पहुंचे। वहां उन्होंने निराहार रहकर अपने प्राण त्यागने का निश्चय किया। सात दिन तक निराहार और निर्जल रहने के बाद, आकाशवाणी हुई कि वे अपने प्राण त्यागें नहीं। यह दुख उनके पूर्व जन्मों के पापों का फल है। यदि चन्द्रिका कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को अहोई माता का व्रत और पूजन करे, तो अहोई देवी प्रसन्न होकर साक्षात दर्शन देंगी। वे उनसे दीर्घायु पुत्रों का वरदान मांग सकती हैं, और व्रत के दिन उन्हें राधाकुंड में स्नान करना होगा।
चन्द्रिका ने आकाशवाणी के अनुसार विधि-विधान से अहोई अष्टमी को व्रत और पूजा-अर्चना की और तत्पश्चात राधाकुंड में स्नान किया। जब वे स्नान के बाद घर लौटे, तो अहोई माता ने उन्हें साक्षात दर्शन देकर वर मांगने को कहा। साहूकार दम्पत्ति ने हाथ जोड़कर प्रार्थना की कि उनके बच्चे अल्पायु में ही परलोक सिधार जाते हैं, इसलिए वे उन्हें बच्चों की दीर्घायु का वरदान दें। “तथास्तु!” कहकर अहोई माता अंतर्ध्यान हो गईं। कुछ समय बाद, साहूकार दम्पत्ति को दीर्घायु पुत्रों की प्राप्ति हुई और उन्होंने सुखपूर्वक अपना गृहस्थ जीवन व्यतीत किया।
देवी पार्वती को ‘अनहोनी को होनी’ बनाने वाली देवी माना जाता है, इसलिए अहोई अष्टमी पर माता पार्वती की पूजा की जाती है और संतानों की दीर्घायु एवं सुखमय जीवन की कामना की जाती है।
– योगेश कुमार गोयल
(लेखक साढ़े तीन दशक से पत्रकारिता में निरंतर सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार हैं)
Discover more from Aware Media News - Hindi News, Breaking News & Latest Updates
Subscribe to get the latest posts sent to your email.


