आस्था की लहरें, सूर्य का आशीर्वाद: छठ – एक अनुपम लोकपर्व का उत्सव
उत्तर भारत की भूमि, विशेषकर बिहार, झारखण्ड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्रों में, एक ऐसा अनूठा पर्व उल्लास के साथ मनाया जाता है जो आस्था और निष्ठा का अनुपम संगम है – ‘छठ’। यह सिर्फ एक पर्व नहीं, बल्कि सूर्यदेव, उनकी ऊर्जावान पत्नी उषा और प्रत्यूषा, प्रकृति के esenciales तत्वों, जल, वायु और सूर्य की चिर-परिचित बहन, छठी मैया को समर्पित एक महापर्व है। उषा और प्रत्यूषा, जिन्हें सूर्य की शक्तियों का मूल माना जाता है, छठ के अनुष्ठान में सूर्यदेव के साथ विशेष पूजनीय हैं। षष्ठी देवी, जिन्हें हम छठ मैया के नाम से जानते हैं, निसंतान दंपतियों को संतान का सुख देती हैं और शिशुओं की रक्षा कर उन्हें दीर्घायु का वरदान प्रदान करती हैं। पुराणों में पष्ठी देवी का ही एक रूप कात्यायनी के नाम से जाना जाता है, जिनकी नवरात्र में षष्ठी तिथि पर विशेष आराधना की जाती है। यह माना जाता है कि छठ पर्व में सूर्य की उपासना से छठी माता प्रसन्न होकर घर-परिवार में सुख-समृद्धि, रोगमुक्ति, सम्पन्नता और मनोवांछित फल प्रदान करती हैं।
इस वर्ष छठ का पावन अवसर 25 अक्टूबर से ‘नहाय-खाय’ के साथ आरंभ हो रहा है, जो चार दिवसीय अनुष्ठान की शुरुआत करेगा।
25 अक्टूबर: नहाय-खाय – इस शुभ दिन, छठ व्रती शुद्ध और सात्विक भोजन तैयार कर प्रसाद के रूप में ग्रहण करते हैं। छठी मैया और सूर्यदेव की महिमा का गान करते हुए, छठ पूजा 2025 का संकल्प इसी दिन लिया जाता है। छठी मैया और आदित्य देव के आगमन का स्वागत उनके स्तुति गीतों से किया जाता है।
26 अक्टूबर: खरना – यह दिन विशेष निष्ठा का प्रतीक है। छठ व्रती छठी मैया को श्रद्धापूर्वक खीर का भोग लगाती हैं। लोहंडा के इस प्रसाद को परिवार, पड़ोसियों और समस्त जनमानस में बांटने की परंपरा है। ऐसी मान्यता है कि खरना का प्रसाद ग्रहण करने से जीवन के सभी दुख दूर हो जाते हैं और छठी मैया व्रती की सभी मनोकामनाएं पूर्ण करती हैं।
27 अक्टूबर: संध्याकालीन अर्घ्य – इस दिन अस्ताचलगामी भगवान भास्कर को संध्याकालीन अर्घ्य अर्पित किया जाएगा। डूबते सूर्य को जल चढ़ाकर, छठ व्रती अपने परिवार की सुख-समृद्धि और संतति वृद्धि की कामना आदित्य देव से करती हैं। ऐसा माना जाता है कि ढ़लते सूरज को अर्घ्य देने से भगवान दिनकर व्रती को असीम आशीष प्रदान करते हैं।
28 अक्टूबर: प्रातःकालीन अर्घ्य – यह महापर्व का अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण दिन है। इस दिन उदीयमान सूर्य को अर्घ्य दिया जाएगा। दीनानाथ के उगते स्वरूप के दर्शन कर छठ व्रती खुशहाली की कामना करती हैं। परिवार के सदस्य भी सामने से व्रती को दूध-जल का अर्घ्य समर्पित कर अपनी निष्ठा व्यक्त करते हैं। छठी मैया से सुख-मंगल की कामना की जाती है। छठ पूजा का प्रसाद छठ घाट पर ही ग्रहण करने का विधान है। अंतिम चरण में व्रती ‘पारण’ कर चार दिवसीय छठ पर्व का अनुष्ठान समाप्त करती हैं।
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नियम, संयम और तपस्या का यह महापर्व यद्यपि चार दिनों का होता है, परंतु इसकी तैयारियाँ कई सप्ताह पूर्व ही प्रारंभ हो जाती हैं। षष्ठी तिथि पर मनाए जाने वाले इस पर्व की जड़ें मूल रूप से बिहार और पूर्वांचल में हैं, लेकिन आज यह न केवल भारत के विभिन्न राज्यों में, बल्कि विदेशों में भी अपनी पहचान बना चुका है। बिहार और पूर्वांचल के अतिरिक्त, अन्य क्षेत्रों के लोग भी अब इस पर्व के प्रति गहरी आस्था रखते हुए इसे मना रहे हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, सूर्य देवता की बहन छठी मैया, संतानों की रक्षा कर उन्हें दीर्घायु प्रदान करती हैं। प्रातःकाल की पहली किरण (उषा) और सायंकाल की अंतिम किरण (प्रत्यूषा) को अर्घ्य देकर दोनों को नमन किया जाता है। कार्तिक शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाए जाने के कारण ही यह पर्व ‘छठ’ कहलाता है। इस चार दिवसीय उत्सव की शुरुआत कार्तिक शुक्ल चतुर्थी को ‘नहाय खाय’ से होती है, अगले दिन ‘खरना’, तीसरे दिन छठ का प्रसाद तैयार कर, स्नान कर अस्त होते सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है, और सप्तमी को, चौथे और अंतिम दिन, उगते सूर्य की पूजा-आराधना के साथ इस महापर्व का समापन होता है। छठ पर्व के प्रसाद में प्रायः चावल के लड्डू बनाए जाते हैं, और बांस की टोकरी में प्रसाद व फल सजाकर, उस टोकरी की भी पूजा की जाती है। व्रत रखने वाली महिलाएं, सूर्य को अर्घ्य देने और पूजा के लिए तालाब, नदी अथवा घाट पर जाकर, स्नान कर डूबते हुए सूर्य की पूजा करती हैं। अगले दिन सूर्योदय के समय सूर्य को अर्घ्य देकर, पूजा संपन्न करने के उपरांत, प्रसाद वितरण के साथ छठ पूजा का समापन होता है। यह महापर्व, जीवनदायी सूर्यदेव के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का एक अनूठा माध्यम है।
छठ महापर्व के उद्भव से जुड़ी कई कथाएं प्रचलित हैं। एक मान्यता के अनुसार, लोक मातृका षष्ठी की प्रथम पूजा स्वयं सूर्यदेव ने की थी। ज्योतिष शास्त्र में सूर्य को सभी ग्रहों का अधिपति माना गया है। इसीलिए यह माना जाता है कि यदि समस्त ग्रहों को प्रसन्न करने के बजाय केवल सूर्यदेव की आराधना की जाए तो कई लाभ प्राप्त हो सकते हैं। ऐसी भी मान्यता है कि सर्वप्रथम महाबली कर्ण ने ही सूर्यदेव की पूजा प्रारंभ की थी, और आज भी छठ पर्व में सूर्य को अर्घ्य देने का विशेष महत्व है। सूर्यपुत्र कर्ण, भगवान सूर्य के परम भक्त थे, जो प्रतिदिन घंटों तक कमर तक पानी में खड़े रहकर सूर्यदेव को अर्घ्य दिया करते थे। सूर्यदेव की कृपा से ही वे एक महान योद्धा बने। एक अन्य कथा के अनुसार, देवमाता अदिति ने प्रथम देवासुर संग्राम में देवताओं की असुरों से हार के पश्चात, तेजस्वी पुत्र की प्राप्ति के लिए देवारण्य के देव सूर्य मंदिर में छठी मैया की आराधना की थी। छठी मैया उनकी आराधना से प्रसन्न होकर उन्हें सर्वगुण संपन्न, तेजस्वी पुत्र को जन्म देने का वरदान दिया। इसके फलस्वरूप अदिति ने त्रिदेव स्वरूप आदित्य भगवान को जन्म दिया, जिन्होंने देवताओं को असुरों पर विजय दिलाई। कहा जाता है कि इसी घटना के पश्चात से छठ पर्व मनाए जाने का चलन शुरू हुआ।
इस पर्व का संबंध महाभारत काल से भी जोड़ा जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब पांडव अपना सारा राजपाट जुए में हार गए थे, तब श्रीकृष्ण के निर्देशानुसार द्रोपदी ने छठ व्रत रखा। छठी मैया के आशीर्वाद से उनकी मनोकामनाएं पूर्ण हुईं और पांडवों को राजपाट वापस मिला। पांडवों की पत्नी द्रोपदी द्वारा अपने परिजनों के उत्तम स्वास्थ्य और लंबी आयु की कामना के लिए नियमित रूप से सूर्य की पूजा करने का उल्लेख भी मिलता है। छठ पूजा के अवसर पर नदियों, तालाबों आदि के किनारे पूजा की जाती है, जिससे लोगों को इन जलस्रोतों के आसपास स्वच्छता बनाए रखने की प्रेरणा मिलती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, छठ पूजा स्वच्छ नदी, तालाबों या अन्य जलस्रोतों के किनारे ही की जाती है, इसलिए पूजा से पूर्व इन जलस्रोतों के आसपास पूरी तरह सफाई करने का विधान है। यह महापर्व नदियों को प्रदूषण से मुक्त रखने की प्रेरणा देता है, इसीलिए इसे सर्वाधिक पर्यावरण अनुकूल हिन्दू त्यौहारों में से एक माना जाता है।
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