धनतेरस 2025: कुबेर देव की कथा, जो बनीं धन के देवता
नई दिल्ली: दीपावली से दो दिन पूर्व मनाया जाने वाला धनतेरस का पावन पर्व इस वर्ष 18 अक्टूबर 2025, शनिवार को मनाया जाएगा। इस शुभ अवसर पर मां लक्ष्मी और भगवान धनवंतरी के साथ-साथ धन के देवता भगवान कुबेर की भी विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। यक्षों के राजा, कुबेर को धन का स्वामी और उत्तर दिशा का दिक्पाल माना जाता है। वे रक्षक लोकपाल भी कहलाते हैं और भगवान शिव के द्वारपाल के रूप में भी प्रतिष्ठित हैं।
पौराणिक कथाओं के अनुसार, कुबेर रावण, कुंभकर्ण और विभीषण के सौतेले भाई थे, परंतु अपने श्रेष्ठ गुणों के कारण उन्होंने देवताओं का दर्जा प्राप्त किया। कुबेर सुख-समृद्धि और धन प्रदान करने वाले देवता हैं, जिन्हें देवताओं का खजांची भी कहा गया है।
उत्तर दिशा में निवास करने वाले कुबेर देवता की प्रतिमा घर की उत्तर दिशा में स्थापित करने से परिवार पर उनकी कृपा बनी रहती है। यह मान्यता है कि भगवान कुबेर, जो भक्तों की तिजोरियां भरते हैं, स्वयं एक समय में गरीब ब्राह्मण थे। आइए जानते हैं कुबेर देवता की वह पौराणिक कथा, जो बताती है कि कैसे एक साधारण ब्राह्मण से वे देवताओं के खजांची बने।
गरीब ब्राह्मण से धन के देवता: कुबेर की अद्भुत गाथा
गुणनिधि का अध:पतन:
पूर्व जन्म में, भगवान कुबेर एक गरीब ब्राह्मण थे, जिनका नाम गुणनिधि था। बचपन में पिता से धर्मशास्त्र की शिक्षा प्राप्त करने के बावजूद, वे बुरी संगति में पड़कर जुआ खेलने लगे। उनकी गलत आदतों से तंग आकर पिता ने उन्हें घर से निकाल दिया। बेघर और असहाय गुणनिधि का जीवन दयनीय हो गया और उन्हें पेट भरने के लिए भिक्षा मांगने पर विवश होना पड़ा।
भोजन की लालसा और शिवालय:
एक दिन, भूख-प्यास से व्याकुल गुणनिधि भटकते हुए एक जंगल में पहुंच गए। वहां उन्होंने कुछ ब्राह्मणों को भगवान के भोग के लिए सामग्री ले जाते देखा। भगवान की भोग सामग्री देखकर गुणनिधि की भूख और बढ़ गई और वे भोजन की लालसा में उस पंडित का पीछा करने लगे, जो उन्हें एक शिवालय तक ले गया।
अनजाने में दीपदान और व्रत:
शिवालय में गुणनिधि ने देखा कि ब्राह्मण भगवान शिव की पूजा-अर्चना में लीन थे। भोजन चुराने के इरादे से गुणनिधि वहीं छिप गए। जब सभी ब्राह्मण सो गए, तो उन्होंने चुपके से शिव प्रतिमा के पास जाकर भोजन चुराने का प्रयास किया। घुप अंधेरे में उन्हें कुछ दिखाई नहीं दे रहा था, इसलिए उन्होंने एक दीपक जलाया। हवा के कारण दीपक बार-बार बुझ जाता, लेकिन गुणनिधि उसे बार-बार जलाते रहे। भोलेनाथ ने इसे अपनी ‘दीपाराधना’ समझा और प्रसन्न होकर गुणनिधि को धनपति होने का आशीर्वाद दिया।
भोजन चुराते समय भूख से व्याकुल गुणनिधि की मृत्यु हो गई, परंतु अनजाने में ही सही, उन्होंने महाशिवरात्रि का व्रत कर लिया था, जिसका उन्हें शुभ फल मिला। इस अनजाने व्रत के प्रभाव से, अगले जन्म में गुणनिधि कलिंग देश के राजा बने।
शिव की कृपा से कुबेर का पद:
अपने नए जन्म में भी, गुणनिधि भगवान शिव के परम भक्त थे और उनकी भक्ति में लीन रहते थे। उनकी कठिन तपस्या और अनन्य भक्ति को देखकर भगवान शिव उन पर अत्यंत प्रसन्न हुए। यह स्वयं भगवान शिव की कृपा थी, जिसके फलस्वरूप एक गरीब ब्राह्मण धन के देवता ‘कुबेर’ के रूप में पूजनीय बने और संसार में धन-धान्य के प्रतीक के रूप में स्थापित हुए।
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