करवा चौथ: सौभाग्य का पर्व, श्रद्धा और भक्ति का संगम
भारतीय संस्कृति में करवा चौथ का पर्व विशेष महत्व रखता है। कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाने वाला यह व्रत, सौभाग्यवती स्त्रियों के लिए अत्यंत पावन माना जाता है। इस दिन विवाहित महिलाएं अपने पति की दीर्घायु, सुख-समृद्धि और अखंड सौभाग्य की कामना से निर्जल उपवास रखती हैं।
गणेश पूजा का महत्व:
भारतीय वाड्मय में किसी भी शुभ कार्य के आरंभ में गणेशजी की पूजा का विधान है, क्योंकि उन्हें प्रथम पूज्य और अनादि देव माना गया है। करवा चौथ के दिन भी सर्वप्रथम गणेशजी की पूजा की जाती है। स्वयं भगवान शिव-पार्वती ने भी अपने विवाह के समय गणेशजी की पूजा की थी, जिसका उल्लेख गोस्वामी तुलसीदास जी ने अपने महाकाव्य में किया है।
व्रत का संकल्प:
करवा चौथ के दिन व्रती को नित्य कर्म से निवृत्त होकर गणेशजी की पूजा के लिए मन में दृढ़ संकल्प करना चाहिए। उन्हें दिन भर निराहार रहकर गणेशजी के ध्यान में लीन रहना होता है और रात्रि में चंद्रोदय तक निर्जल व्रत का पालन करना होता है।
पूजा विधि:
सायंकाल में घर की दीवार को गोबर से लीपकर उस पर गेरू की स्याही से गणेश, पार्वती, शिव, कार्तिकेय आदि देवों की प्रतिमाएं चित्रित की जाती हैं। साथ ही, एक वटवृक्ष मानव की आकृति बनाई जाती है, जिसके हाथ में छलनी होती है। उदित होते हुए चांद की आकृति भी दीवार पर चित्रित की जाती है।
पूजा काल में प्रतिमा के नीचे दो करवों (विशेष प्रकार के पात्र) में जल भरा जाता है। करवे के गले में नारा लपेटकर सिंदूर से रंगा जाता है और उसकी टोंटी में सरई की सींक लगाई जाती है। इसके ऊपर चावल से भरा कटोरा और सुपारी रखी जाती है। नैवेद्य के रूप में चावल का लड्डू, खीर, पूड़ी, उड़द की पीठी भरे पकवान और ऋतु फल जैसे सिंघाड़ा, केला, नारंगी, गन्ना आदि अर्पित किए जाते हैं।
भक्तिपूर्वक कथा श्रवण के पश्चात, पूर्व में स्थापित करवों को दाहिनी ओर से बाईं ओर और बाईं ओर रखे करवे को दाहिनी ओर घुमाकर स्थापित किया जाता है, जिसे लोकभाषा में ‘करवा फेरना’ भी कहा जाता है। विधिपूर्वक पूजन से गणेशजी प्रसन्न होते हैं और व्रती को मनोवांछित फल की प्राप्ति तथा अखण्ड सौभाग्य मिलता है।
करवा चौथ व्रत कथा:
एक पतिव्रता स्त्री ‘करवा’ अपने पति के साथ नदी किनारे के गांव में रहती थी। एक दिन नदी में स्नान करते समय मगर ने उसके पति का पैर पकड़ लिया। करवा ने साहस दिखाते हुए मगर को कच्चे धागे से बांध दिया और यमराज के पास पहुंचकर उसे दंडित करने की प्रार्थना की। यमराज के आयु शेष होने के कारण मना करने पर, करवा ने यमराज को श्राप देने की धमकी दी। यमराज भयभीत होकर करवा के साथ मगर को यमपुरी भेज देते हैं और करवा के पति को दीर्घायु प्रदान करते हैं।
महाभारत में वर्णित कथा:
महाभारत में भी करवा चौथ के माहात्म्य का वर्णन मिलता है। एक बार अर्जुन तपस्या पर गये हुए थे, तब द्रौपदी ने अपने कष्टों के निवारण हेतु श्रीकृष्ण का ध्यान किया। श्रीकृष्ण ने उन्हें पार्वती जी द्वारा शिवजी से पूछे गए प्रश्न का उल्लेख करते हुए बताया कि करवा चौथ का व्रत गृहस्थी की विघ्न-बाधाओं को दूर करता है। उन्होंने द्रौपदी को एक प्राचीन कथा सुनाई: एक धर्मपरायण ब्राह्मण की सात पुत्रों और एक पुत्री थी। पुत्री ने कार्तिक की चतुर्थी को करवा चौथ का व्रत रखा। सात भाइयों की लाडली बहन भूख से व्याकुल थी। भाइयों ने चालाकी से चंद्रोदय होने का भ्रम पैदा कर उसे भोजन करा दिया। पर समय से पहले भोजन करने के कारण उसका पति मर गया। इन्द्राणी ने उसे सलाह दी कि यदि वह बारह महीनों तक प्रत्येक चौथ को विधिपूर्वक व्रत करे और करवा चौथ को गौरी, शिव, गणेश, कार्तिकेय सहित चंद्रमा का पूजन कर चंद्रोदय के बाद अर्घ्य देकर अन्न-जल ग्रहण करे, तो उसका पति जीवित हो उठेगा। ब्राम्हण कन्या ने ऐसा ही किया और उसका मृत पति जीवित हो गया। श्रीकृष्ण ने द्रौपदी को भी यह व्रत विधिपूर्वक करने की सलाह दी, जिससे महाभारत युद्ध में पांडवों की विजय हुई।
करवा चौथ का यह व्रत, श्रद्धा, भक्ति और पति-पत्नी के अटूट प्रेम का प्रतीक है, जो जीवन में सुख, सौभाग्य और धन-धान्य की वृद्धि करता है।
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