रामचरितमानस: भाग 34 का सार

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रामचरितमानस: भाग 34 का सार
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पवित्र रामकथा का एक अद्भुत प्रसंग: शिव-पार्वती विवाह की अद्भुत झाँकी

शुभ संकल्प:
श्री रामचन्द्राय नमः

शिव-पार्वती विवाह का मंगलमय वर्णन

पुण्य, पाप नाशक, सदा कल्याणकारी, ज्ञान और भक्ति प्रदान करने वाला, माया-मोह के मैल को दूर करने वाला, निर्मल, प्रेम के जल से परिपूर्ण यह शुभ श्रीरामचरितमानस है। जो भक्तजन श्रद्धापूर्वक इसमें अवगाहन करते हैं, वे संसार रूपी सूर्य के भयानक ताप से नहीं जलते।

दोहा:
जिस पवित्र नगरी में स्वयं जगदम्बा ने अवतार लिया, क्या उसका वर्णन किया जा सकता है? वहाँ ऋद्धि, सिद्धि, सम्पत्ति और सुख नित-नए बढ़ते जाते हैं।

चौपाई:
नगर के निकट बारात के आगमन का समाचार सुनकर नगर में हलचल मच गई, जिससे उसकी शोभा और भी बढ़ गई। अगवानी करने वाले लोग अपने को सजा-संवारकर और नाना प्रकार की सवारियों को तैयार करके, आदर सहित बारात को लेने चल पड़े।

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चौपाई:
बारात में देवताओं के समाज को देखकर सब मन में प्रसन्न हुए और स्वयं विष्णु भगवान को देखकर तो वे बहुत ही आनंदित हुए। किन्तु जब उन्होंने शिवजी की विचित्र बारात को देखा, तो उनके सभी वाहन, हाथी, घोड़े, बैल आदि डरकर भाग खड़े हुए।

चौपाई:
कुछ समझदार, अनुभवी लोग तो धैर्य धरकर वहीं खड़े रहे, परन्तु छोटे-छोटे बच्चे तो अपनी जान बचाकर भाग खड़े हुए। घर पहुँचने पर जब माता-पिता ने उनसे पूछा, तो वे भय से कांपते हुए शरीर से अपनी व्यथा कहने लगे।

चौपाई:
"क्या कहें, कोई बात कही नहीं जाती। यह बारात है या यमराज की सेना? दूल्हा बावला है और बैल पर सवार है। साँप, खोपड़ी और भस्म ही उसके आभूषण हैं।"

छन्द:
दूल्हे के तन पर भस्म लगी है, साँप और खोपड़ी के आभूषण हैं, वह नग्न, जटाधारी और भयंकर है। उसके साथ भयानक मुखवाले भूत, प्रेत, पिशाच, योगिनियाँ और राक्षस हैं। जो इस बारात को देखकर जीवित बचेगा, सचमुच उसके बड़े पुण्य होंगे और वही उमा का विवाह देखेगा। लड़कों ने घर-घर यही बात कही।

दोहा:
महेश्वर (शिवजी) के इस विचित्र समाज को समझकर, सभी बच्चों के माता-पिता मुस्कुराए। उन्होंने तरह-तरह से बच्चों को समझाया कि निडर हो जाओ, डरने की कोई बात नहीं है।

चौपाई:
अगवानी करने वाले लोग बारात को लिवा लाए और सबने उन्हें सुंदर जनवासे (ठहरने के स्थान) दिए। पार्वतीजी की माता मैना ने शुभ आरती सजाई और उनके साथ की स्त्रियाँ उत्तम मंगलगीत गाने लगीं।

चौपाई:
सुंदर हाथों में सोने का थाल सुशोभित है। इस प्रकार मैना हर्ष के साथ शिवजी का परछन ( आरती उतारना) करने चलीं। जब उन्होंने महादेवजी को भयानक वेष में देखा, तब तो स्त्रियों के मन में बड़ा भारी भय उत्पन्न हो गया।

चौपाई:
बहुत अधिक डर के मारे वे भागकर घर में घुस गईं और शिवजी जहाँ जनवासे में थे, वहाँ चले गए। मैना के हृदय में बड़ा दुःख हुआ, उन्होंने पार्वतीजी को अपने पास बुला लिया।

चौपाई:
और अत्यन्त स्नेह से उन्हें गोद में बिठाकर, अपने नीलकमल के समान नेत्रों में आँसू भरकर बोलीं – "जिस विधाता ने तुमको ऐसा सुंदर रूप दिया, उस मूर्ख ने तुम्हारे दूल्हे को बावला कैसे बनाया?"

छन्द:
किस प्रकार विधाता ने तुमको सुंदरता दी और तुम्हारे लिए ऐसा बावला वर बनाया? जो फल कल्पवृक्ष में लगना चाहिए, वह जबर्दस्ती बबूल में लग रहा है। मैं तुम्हें लेकर पहाड़ से गिर पड़ूँगी, आग में जल जाऊँगी या समुद्र में कूद पड़ूँगी। चाहे घर उजड़ जाए और संसार भर में अपकीर्ति फैल जाए, पर जीते जी मैं इस बावले वर से तुम्हारा विवाह न करूँगी।

दोहा:
हिमाचल की स्त्री मैना को दुःखी देखकर सभी स्त्रियाँ व्याकुल हो गईं। मैना अपनी कन्या के स्नेह को याद करके विलाप करती, रोती और कहती थीं-

चौपाई:
"मैंने नारद का क्या बिगाड़ा था, जिन्होंने मेरा बसता हुआ घर उजाड़ दिया और जिन्होंने पार्वती को ऐसा उपदेश दिया कि जिससे उसने बावले वर के लिए तपस्या की?"

चौपाई:
"सचमुच, उनका न किसी का मोह है, न माया, न उनके पास धन है, न घर है और न स्त्री ही है, वे सबसे उदासीन हैं। इसी से वे दूसरे का घर उजाड़ने वाले हैं। उन्हें न किसी की लाज है, न डर है। भला, बाँझ स्त्री प्रसव की पीड़ा को क्या जाने?"

चौपाई:
माता को विकल देखकर पार्वतीजी विवेकयुक्त कोमल वाणी में बोलीं- "हे माता! जो विधाता रच देते हैं, वह टलता नहीं, ऐसा विचार कर तुम सोच मत करो!"

चौपाई:
"जो मेरे भाग्य में बावला ही पति लिखा है, तो किसी को क्यों दोष लगाया जाए? हे माता! क्या विधाता के लिखे हुए (कर्म) तुमसे मिट सकते हैं? व्यर्थ ही कलंक का टीका मत लो।"

छन्द:
"हे माता! कलंक मत लो, रोना छोड़ो, यह अवसर विषाद करने का नहीं है। मेरे भाग्य में जो दुःख-सुख लिखा है, उसे मैं जहाँ जाऊँगी, वहीं पाऊँगी!" पार्वतीजी के ऐसे विनय भरे कोमल वचन सुनकर सभी स्त्रियाँ सोच में पड़ गईं और भाँति-भाँति से विधाता को दोष देकर आँखों से आँसू बहाने लगीं।

शेष अगले प्रसंग में ————-

राम रामेति रामेति, रमे रामे मनोरमे ।
सहस्रनाम तत्तुल्यं, रामनाम वरानने ॥

  • आरएन तिवारी


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