श्री रामचन्द्राय नमः
एक असाधारण बारात और दिव्य विवाह की तैयारी
पुण्य, पाप नाशक, सदा कल्याणकारी, ज्ञान और भक्ति प्रदान करने वाले, माया-मोह के मल को दूर करने वाले, निर्मल, प्रेम के जल से भरे, शुभ ‘श्रीरामचरितमानस’ में जो भक्त प्रेम से अवगाहन करते हैं, वे मनुष्य संसार-रूपी सूर्य के भयंकर ताप से नहीं जलते।
शिवजी की विचित्र बारात और विवाह की तैयारी
दोहा:
सकल देवता अपने भांति-भांति के वाहन और विमान सजाने लगे। कल्याणप्रद मंगल शकुन होने लगे और अप्सराएँ गाने लगीं।
चौपाई:
शिवजी के गण शिवजी का श्रृंगार करने लगे। जटाओं के मुकुट पर साँपों का मौर सजाया गया। शिवजी ने साँपों के ही कुंडल और कंकण पहने, शरीर पर विभूति रमायी और वस्त्र की जगह बाघम्बर लपेट लिया।
चंद्रमा मस्तक पर, गंगाजी जटाओं में, तीन नेत्र, साँपों का जनेऊ, गले में विष और छाती पर नरमुण्डों की माला थी। ऐसे अशुभ वेष में भी वे कल्याण के धाम और कृपालु थे।
एक हाथ में त्रिशूल और दूसरे में डमरू सुशोभित था। शिवजी बैल पर चढ़कर चले, बाजे बज रहे थे। शिवजी को देखकर देवांगनाएँ मुस्कुरा रही थीं और सोच रही थीं कि इस वर के योग्य दुलहिन संसार में नहीं मिलेगी।
विष्णु और ब्रह्मा आदि देवताओं के समूह अपने-अपने वाहनों पर चढ़कर बारात में चले। देवताओं का समाज सब प्रकार से अनुपम था, पर दूल्हे के योग्य बारात न थी।
दोहा:
तब विष्णु भगवान ने सब दिक्पालों को बुलाकर हँसकर ऐसा कहा – "सब लोग अपने-अपने दल समेत अलग-अलग होकर चलो।"
चौपाई:
"हे भाई! हम लोगों की यह बारात वर के योग्य नहीं है। क्या पराए नगर में जाकर हँसी कराओगे?" विष्णु भगवान की बात सुनकर देवता मुस्कुराए और वे अपनी-अपनी सेना सहित अलग हो गए।
महादेवजी (यह देखकर) मन-ही-मन मुस्कुराते हैं कि विष्णु भगवान के व्यंग्य-वचन नहीं छूटते! अपने प्यारे (विष्णु भगवान) के इन अति प्रिय वचनों को सुनकर शिवजी ने भी भृंगी को भेजकर अपने सब गणों को बुलवा लिया।
शिवजी की आज्ञा सुनते ही सब चले आए और उन्होंने स्वामी के चरण कमलों में सिर नवाया। तरह-तरह की सवारियों और तरह-तरह के वेष वाले अपने समाज को देखकर शिवजी हँसे।
कोई बिना मुख का है, किसी के बहुत से मुख हैं, कोई बिना हाथ-पैर का है तो किसी के कई हाथ-पैर हैं। किसी की बहुत आँखें हैं तो किसी की एक भी आँख नहीं है। कोई बहुत मोटा-ताजा है, तो कोई बहुत ही दुबला-पतला है।
छंद:
कोई बहुत दुबला, कोई बहुत मोटा, कोई पवित्र और कोई अपवित्र वेष धारण किए हुए है। भयंकर गहने पहने हाथ में कपाल लिए हैं और सबके शरीर में ताजा खून लपेटा हुआ है। गधे, कुत्ते, सूअर और सियार के से उनके मुख हैं। गणों के अनगिनत वेषों को कौन गिने? बहुत प्रकार के प्रेत, पिशाच और योगिनियों की जमाते हैं। उनका वर्णन करते नहीं बनता।
सोरठा:
भूत-प्रेत नाचते और गाते हैं, वे सब बड़े मौजी हैं। देखने में बहुत ही बेढंगे जान पड़ते हैं और बड़े ही विचित्र ढंग से बोलते हैं।
चौपाई:
जैसा दूल्हा है, अब वैसी ही बारात बन गई है। मार्ग में चलते हुए भाँति-भाँति के कौतुक (तमाशे) होते जाते हैं। इधर हिमाचल ने ऐसा विचित्र मण्डप बनाया कि जिसका वर्णन नहीं हो सकता।
जगत में जितने छोटे-बड़े पर्वत थे, जिनका वर्णन करके पार नहीं मिलता तथा जितने वन, समुद्र, नदियाँ और तालाब थे, हिमाचल ने सबको नेवता भेजा।
वे सब अपनी इच्छानुसार रूप धारण करने वाले सुंदर शरीर धारण कर सुंदरी स्त्रियों और समाजों के साथ हिमाचल के घर गए। सभी स्नेह सहित मंगल गीत गा रहे हैं।
हिमाचल ने पहले ही से बहुत से घर सजवा रखे थे। यथायोग्य उन-उन स्थानों में सब लोग उतर गए। नगर की सुंदर शोभा देखकर ब्रह्मा की रचना चातुरी भी तुच्छ लगती थी।
छंद:
नगर की शोभा देखकर ब्रह्मा की निपुणता सचमुच तुच्छ लगती है। वन, बाग, कुएँ, तालाब, नदियाँ सभी सुंदर हैं, उनका वर्णन कौन कर सकता है? घर-घर बहुत से मंगल सूचक तोरण और ध्वजा-पताकाएँ सुशोभित हो रही हैं। वहाँ के सुंदर और चतुर स्त्री-पुरुषों की छबि देखकर मुनियों के भी मन मोहित हो जाते हैं।
शेष अगले प्रसंग में…
राम रामेति रामेति, रमे रामे मनोरमे ।
सहस्रनाम तत्तुल्यं, रामनाम वरानने ॥
- आरएन तिवारी
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