विश्वेश्वर व्रत 2025: भीष्म पंचक का तीसरा दिन, महत्व और कथा

By
Aware Media Network
Aware Media Network एक स्वतंत्र डिजिटल न्यूज़ प्लेटफॉर्म है, जो देश-दुनिया की महत्वपूर्ण खबरें, विश्लेषण और तथ्यात्मक रिपोर्टिंग पाठकों तक पहुंचाने के लिए प्रतिबद्ध है। हमारी...
- News Desk
4 Min Read
Vishweshwar Vrat 2025: भीष्म पंचक के तीसरे दिन किया जाता है विश्वेश्वर व्रत, जानिए महत्व और कथा

शिव की कृपा का पर्व: विश्वेश्वर व्रत का महात्म्य और कथा

हिंदू धर्म में अनगिनत व्रत-त्योहारों की श्रृंखला है, जिनमें से प्रत्येक का अपना अनूठा महत्व है। इसी कड़ी में विश्वेश्वर व्रत का स्थान अत्यंत विशिष्ट है। त्रिनेत्रधारी भगवान शिव को ‘विश्वेश्वर’ के नाम से जाना जाता है, और यह पावन व्रत शुभ प्रदोष के दिन पड़ता है। इस वर्ष, 03 नवंबर 2025 को, हम इस कल्याणकारी व्रत का अनुष्ठान करेंगे। भगवान शिव, जिन्हें ‘विश्वनाथ’ के नाम से भी पूजते हैं, का ही वह दिव्य ज्योतिर्लिंग है जो काशी में ‘काशी विश्वनाथ मंदिर’ के रूप में प्रतिष्ठित है। विश्वेश्वर व्रत, कार्तिक मास की पूर्णिमा से पूर्व, भीष्म पंचक के तीसरे दिन मनाया जाता है।

विश्वेश्वर व्रत: सुख-शांति और समृद्धि का द्वार

इस व्रत की महिमा अतुलनीय है। भगवान शिव को समर्पित यह अनुष्ठान, भक्तों की मनोकामनाओं को पूर्ण करने की शक्ति रखता है। माना जाता है कि इस व्रत के प्रभाव से भगवान शिव की असीम कृपा प्राप्त होती है। कर्नाटक राज्य में भगवान शिव के इसी स्वरूप को समर्पित ‘विश्वेश्वर मंदिर’ स्थित है। इस व्रत के पालन से जातकों के जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का संचार होता है।

शुभ मुहूर्त: 03 नवंबर 2025

भगवान शिव को समर्पित यह विशेष व्रत, कार्तिक पूर्णिमा से पूर्व आने वाले भीष्म पंचक के पांच दिवसीय उत्सव के तीसरे दिन मनाया जाता है। इस वर्ष, 03 नवंबर 2025 को, विश्वेश्वर व्रत का पर्व मनाया जाएगा। इस शुभ दिन पर, भगवान शिव का रुद्राभिषेक करना भी अत्यंत फलदायी माना जाता है।

विश्वेश्वर व्रत की दिव्य कथा

विश्वेश्वर व्रत से जुड़ी एक अत्यंत मार्मिक कथा प्रचलित है। प्राचीन काल में, कुथार राजवंश में राजा कुंडा नामक एक प्रजावत्सल शासक थे। उन्होंने ऋषि भार्गव को अपने राज्य में पधारने का आमंत्रण भेजा। परंतु, ऋषि ने निमंत्रण स्वीकार करने से मना कर दिया, यह कहते हुए कि उनके राज्य में न तो कोई भव्य मंदिर है और न ही पवित्र नदियाँ, जहाँ वे कार्तिक पूर्णिमा से पहले भीष्म पंचक के तीसरे दिन पूजा-अर्चना कर सकें। राजा कुंडा ने जब यह सुना, तो वे विचलित हो गए। उन्होंने अपने राज्य का त्याग कर दिया और भगवान शिव की कठोर तपस्या में लीन हो गए।

अथक तपस्या से प्रसन्न होकर, भगवान शिव राजा कुंडा के समक्ष प्रकट हुए। राजा ने उनसे अपने राज्य में निवास करने का वरदान मांगा, जिसे शिवजी ने स्वीकार कर लिया। भगवान शिव एक कंद के वृक्ष में निवास करने लगे। एक दिन, एक आदिवासी महिला अपने खोए हुए पुत्र की तलाश में जंगल में भटक रही थी। जब वह उस कंद के वृक्ष के पास पहुंची, तो उसने अपने पुत्र को ढूंढने की उम्मीद में तलवार से वृक्ष पर प्रहार किया। तलवार लगते ही वृक्ष से रक्त बहने लगा।

यह देखकर महिला भयभीत हो गई, उसे लगा कि उसने कंद समझकर अपने पुत्र पर ही प्रहार कर दिया है। अत्यंत दुखी होकर, वह अपने पुत्र ‘येलू’ का नाम पुकारकर विलाप करने लगी। तभी, भगवान शिव लिंग रूप में उसी स्थान पर प्रकट हुए। यह भी माना जाता है कि उस महिला की तलवार का घाव आज भी येलुरू श्री विश्वेश्वर मंदिर के लिंग पर देखा जा सकता है। कर्नाटक का येलुरु श्री विश्वेश्वर मंदिर उसी पवित्र स्थल पर निर्मित है, जहाँ भगवान शिव ने इस प्रकार अपना दिव्य रूप प्रकट किया था।


Discover more from Aware Media News - Hindi News, Breaking News & Latest Updates

Subscribe to get the latest posts sent to your email.

Share This Article
Follow:
Aware Media Network एक स्वतंत्र डिजिटल न्यूज़ प्लेटफॉर्म है, जो देश-दुनिया की महत्वपूर्ण खबरें, विश्लेषण और तथ्यात्मक रिपोर्टिंग पाठकों तक पहुंचाने के लिए प्रतिबद्ध है। हमारी संपादकीय टीम विश्वसनीय स्रोतों, आधिकारिक आंकड़ों और पत्रकारिता के नैतिक सिद्धांतों के आधार पर समाचार तैयार करती है। Aware Media Network का उद्देश्य निष्पक्ष, सटीक और समय पर जानकारी प्रदान करना है, ताकि पाठक जागरूक निर्णय ले सकें और समसामयिक घटनाओं को बेहतर ढंग से समझ सकें।
कोई टिप्पणी नहीं

प्रातिक्रिया दे

आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

Exit mobile version