जब-जब अधर्म का साया मंडराया, तब-तब धरती पर अवतरित हुए पालनहार!
हमारी यह पावन भूमि सदियों से धर्म और अधर्म के बीच संघर्ष की गवाह रही है। जब भी अधर्म ने अपने पैर पसारे और अच्छाई पर बुराई की विजय का भय मंडराने लगा, तब-तब जगत के रक्षक, भगवान श्रीहरि विष्णु ने धर्म की रक्षा के लिए धरा पर अवतार लिया। इतना ही नहीं, जब भी कोई भक्त अपने कष्टों से घिर जाता है, तो प्रभु स्वयं उसकी रक्षा के लिए प्रकट होते हैं।
भक्त प्रह्लाद का स्मरण करें, जब हिरण्यकश्यप जैसे आततायी के अत्याचार चरम पर थे, तब भगवान श्रीहरि ने नरसिंह का अवतार धारण कर अपने प्रिय भक्त को अभय दान दिया और दुष्ट का संहार किया। वहीं, त्रेतायुग में, जब दैत्यराज बलि ने तीनों लोकों पर अपना अधिपत्य जमा लिया था, तब भगवान विष्णु ने वामन अवतार लेकर धर्म की पुनर्स्थापना की। वामन देव, भगवान विष्णु के पांचवें अवतार माने जाते हैं। इससे पहले वे मत्स्य, कूर्म, वाराह और नरसिंह जैसे अवतारों में धरा पर पधारे।
आज, हम इसी दिव्य यात्रा के दो महत्वपूर्ण पड़ावों, नरसिंह और वाराह अवतार की हृदयस्पर्शी कथाओं का श्रवण करेंगे।
नरसिंह अवतार की अलौकिक गाथा
प्राचीन काल की बात है, कश्यप नामक एक महान ऋषि थे। उनकी पत्नी दिति के गर्भ से दो तेजस्वी पुत्रों का जन्म हुआ – हिरण्याक्ष और हिरण्यकश्यप। इन्हीं में से एक, हिरण्याक्ष को पृथ्वी की रक्षा के लिए भगवान विष्णु ने अपने वराह अवतार में मृत्युदंड दिया था। अपने प्रिय भाई की मृत्यु से व्यथित हिरण्यकश्यप ने अपने भाई का बदला लेने की ठानी। उसने हजारों वर्षों तक घोर तपस्या की, जिसके फलस्वरूप ब्रह्माजी ने प्रसन्न होकर उसे ऐसा वरदान दिया कि न कोई उसे घर के भीतर या बाहर मार सके, न किसी अस्त्र-शस्त्र से, न दिन-रात में, न मनुष्य या पशु द्वारा, न आकाश या पृथ्वी पर।
इस अमूल्य वरदान को प्राप्त कर हिरण्यकश्यप अत्यंत अहंकारी हो गया। उसने इंद्र से युद्ध कर स्वर्ग पर अधिकार जमा लिया और तीनों लोकों पर अपना राज स्थापित कर लिया। उसका अत्याचार इतना बढ़ गया कि उसने प्रजा को स्वयं को भगवान मानने का आदेश दे दिया। जो भी उसके आदेश का पालन न करे, उसे कठोर दंड मिलता। उसकी क्रूरता और अत्याचारों की कोई सीमा न रही, और वह प्रभु के भक्तों को विशेष रूप से प्रताड़ित करने लगा।
विडंबना देखिए, उस आततायी हिरण्यकश्यप का पुत्र, प्रह्लाद, भगवान विष्णु का परम भक्त था। पिता के विपरीत, प्रह्लाद की निष्ठा प्रभु में अटूट थी। हिरण्यकश्यप को यह बिल्कुल पसंद नहीं था। अपने पुत्र की विष्णु भक्ति से क्रोधित होकर, उसने कई बार प्रह्लाद का वध करने का प्रयास किया, परंतु हर बार प्रभु की कृपा से प्रह्लाद सुरक्षित रहा। जब हिरण्यकश्यप के अत्याचारों की सारी सीमाएं लांघ दी गईं, तो भक्त प्रह्लाद की रक्षा के लिए स्वयं भगवान विष्णु नरसिंह के रूप में प्रकट हुए।
भगवान नरसिंह ने न दिन का समय चुना, न रात का, बल्कि दोनों के बीच की संधि वेला में, आधे मनुष्य और आधे सिंह का विकराल रूप धारण किया। उन्होंने हिरण्यकश्यप को अपने श्रीमुख के द्वार की चौखट पर लिटाया और अपने तीक्ष्ण, सिंह जैसे नाखूनों से उसका उदर विदीर्ण कर दिया। इस प्रकार, भगवान विष्णु ने भक्त प्रह्लाद को बचाया और अधर्म का नाश किया।
वामन अवतार की ज्ञानवर्धक कथा
दैत्यराज बलि एक अत्यंत पराक्रमी और शक्तिशाली राजा था। उसने अपने बल से तीनों लोकों पर अपना शासन स्थापित कर लिया था। यद्यपि बलि स्वभाव से क्रूर और अहंकारी था, फिर भी वह भगवान विष्णु का एक महान भक्त था। वह खूब दान-पुण्य करता था, इसी कारण वह इंद्रदेव के स्थान पर स्वर्ग का स्वामी बन बैठा। राजा बलि ने अपने पद और शक्ति का दुरुपयोग करना शुरू कर दिया और देवी-देवताओं को निरंतर परेशान करने लगा।
बलि के अत्याचारों से त्रस्त होकर, सभी देवी-देवताओं ने भगवान विष्णु से सहायता की गुहार लगाई। श्रीहरि ने उन्हें आश्वासन दिया कि वे राजा बलि के घमंड को तोड़ेंगे और तीनों लोकों को उसके चंगुल से मुक्त कराएंगे। इस वचन को पूरा करने के लिए, भगवान विष्णु ने त्रेतायुग में, भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को, मां अदिति और ऋषि कश्यप के पुत्र के रूप में अवतरित हुए। यही भगवान विष्णु का वामन अवतार था।
भगवान वामन, एक छोटे कद के बटुक ब्राह्मण का रूप धारण कर राजा बलि की सभा में पहुंचे। उनके एक हाथ में लकड़ी थी और दूसरे में छाता। वामन देव ने राजा बलि से तीन पग भूमि दान में मांगी। राजा बलि अपनी वचनबद्धता और दानवीरता के लिए जाने जाते थे। इस पर असुर गुरु शुक्राचार्य ने उन्हें आगाह किया कि वे किसी भी ऐसे वचन को न दें। परंतु, राजा बलि ने बटुक ब्राह्मण को तीन पग भूमि देने का वचन दे ही दिया।
जैसे ही वचन दिया गया, भगवान वामन देव ने अपना विशाल रूप धारण कर लिया। अपने एक पग से उन्होंने पूरी पृथ्वी को नाप लिया, और दूसरे पग से स्वर्ग लोक को। जब तीसरे पग के लिए कोई स्थान शेष नहीं रहा, तो राजा बलि ने अपना सिर वामन देव के आगे झुका दिया। इस प्रकार, भगवान वामन ने राजा बलि के अहंकार का नाश किया। परंतु, राजा बलि की वचनबद्धता से प्रसन्न होकर, भगवान वामन ने उसे पाताल लोक का राजा बना दिया। जैसे ही वामन देव ने अपना तीसरा पग राजा बलि के सिर पर रखा, वह तुरंत पाताल में विलीन हो गए। भगवान विष्णु की कृपा से, राजा बलि ने पाताल लोक में अनंतकाल तक राज किया।
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