अस्ताना में इतिहास रचने वाली मनीषा भानवाला: पिता की यादें और लॉस एंजिलिस का अटूट सपना
भारत की कुश्ती के इतिहास में स्वर्णिम अध्याय लिखने वाली मनीषा भानवाला की नजरें अब लॉस एंजिलिस ओलंपिक के 57 किलोवर्ग में पदक जीतने पर टिकी हैं। 29 वर्षीय इस अनुभवी पहलवान की असली ताकत उनके पिता हैं, जो आज भले ही दुनिया में न हों, पर उनकी यादें मनीषा के दिल की धड़कन बनकर साथ चलती हैं। कजाखस्तान के अस्ताना में मनीषा ने वह मुकाम हासिल किया, जो आज तक कोई भारतीय महिला पहलवान नहीं कर सकी थी—सीनियर कुश्ती विश्व चैम्पियनशिप में स्वर्ण पदक जीतना। एशियाई खेलों की कसक को पीछे छोड़ते हुए उन्होंने अपने करियर की सबसे गौरवमयी जीत दर्ज की।
एशियाई खेलों से खाली हाथ लौटने के बाद मनीषा टूटी नहीं, बल्कि अपने कोच वीरेंदर दहिया के मार्गदर्शन में नए संकल्प के साथ विश्व चैम्पियनशिप की तैयारी में जुट गईं। भारतीय कुश्ती महासंघ द्वारा आयोजित बातचीत में उन्होंने भावुक होते हुए कहा, “एशियाई खेलों में किस्मत ने मुंह मोड़ लिया था, लेकिन मैं अपने कोच से निरंतर अभ्यास और रिकवरी पर चर्चा करती रही। उन्होंने मुझसे कहा कि अब पूरा ध्यान विश्व चैम्पियनशिप पर होना चाहिए। मुझे उनके वे शब्द आज भी याद हैं—’ईश्वर ने तुम्हारे लिए कुछ बहुत बड़ा सोच रखा है’।”
एशियाई खेलों में 57 किलोवर्ग में उतरने वाली मनीषा ने विश्व चैम्पियनशिप के लिए 59 किलोवर्ग को चुना। दोनों बड़े टूर्नामेंटों के बीच समय का अभाव था, जिससे वजन कम करना और शरीर को रिकवर करना एक बड़ी चुनौती थी। उन्होंने साझा किया, “एशियाई खेलों में पदक का मुझे पूरा भरोसा था, लेकिन वहां से लौटने के बाद विश्व चैम्पियनशिप के लिए महज 10 दिन का समय बचा था। इतने कम समय में वजन घटाना कठिन था, इसलिए मैंने 59 किलो में उतरने का साहसी निर्णय लिया।”
मनीषा के लिए यह स्वर्ण पदक केवल एक जीत नहीं, बल्कि एक श्रद्धांजलि है। उनके पिता, जिन्होंने उन्हें कुश्ती की दुनिया में कदम रखना सिखाया, 2022 में उनका साथ छोड़ गए थे। विश्व चैम्पियनशिप के फाइनल मुकाबले से पहले मनीषा ने अपने पिता की याद में एक विशेष टी-शर्ट पहनी थी। मनीषा कहती हैं, “मेरे पिता की मेरे जीवन में क्या भूमिका है, इसे शब्दों में बयां करना नामुमकिन है। मैं आज भी उनसे बातें करती हूं, जैसे वह मेरे भीतर ही मौजूद हों। वह मेरे अस्तित्व का हिस्सा हैं।”
अपने पिता के सिद्धांतों को याद करते हुए उन्होंने कहा, “पिताजी ने हमेशा सिखाया कि या तो किसी काम को हाथ में मत लो, और अगर लो, तो उसे पूरा अंजाम तक पहुंचाकर ही दम लो। यह जिद मेरे खून में है। कुश्ती मेरे लिए केवल एक विकल्प नहीं, बल्कि मेरी जिंदगी का पहला और आखिरी जुनून है। इसी खेल ने मुझे पहचान, सम्मान और जीने का असली सामर्थ्य दिया है।”
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