PM मोदी के ‘दिमागी नक्सल’ बयान से गरमाई सियासत, चिदंबरम ने कहा गर्व है, जयराम रमेश ने भी साधा निशाना आज

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PEEYUSH UPADHYAY
पीयुष उपाध्याय एक अनुभवी समाचार संपादक हैं, जो Aware Media Network के लिए देश-दुनिया की प्रमुख खबरों, विश्लेषण और तथ्यात्मक रिपोर्टिंग सुनिश्चित करते हैं। उनका अनुभव...
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PM मोदी के ‘दिमागी नक्सल’ बयान से गरमाई सियासत, चिदंबरम ने कहा गर्व है, जयराम रमेश ने भी साधा निशाना आज

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वतंत्रता दिवस संबोधन में इस्तेमाल किए गए ‘दिमागी नक्सल’ शब्द ने राजनीतिक बहस को गर्म कर दिया है। कांग्रेस नेता पी. चिदंबरम ने तंज कसते हुए खुद को ‘दिमागी नक्सल’ कहे जाने पर गर्व जताया, जबकि जयराम रमेश और वाम नेताओं ने भी सवाल उठाए।

लाल किले से PM मोदी ने क्या कहा?

15 अगस्त को लाल किले की प्राचीर से राष्ट्र को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नक्सलवाद के खिलाफ सरकार की कार्रवाई का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि सशस्त्र नक्सलवाद कमजोर हुआ है, लेकिन माओवादी विचारधारा वाली मानसिकता अभी भी मौजूद है।

PM मोदी ने इसी संदर्भ में ‘दिमागी नक्सल’ शब्द का इस्तेमाल करते हुए ऐसी मानसिकता को पहचानने और अलग-थलग करने की अपील की। उन्होंने दावा किया कि पहले ऐसी सोच रखने वाले लोग सरकारी समितियों और नीति निर्माण की प्रक्रिया में प्रभाव रखते थे।

चिदंबरम बोले- ‘मुझे दिमागी नक्सल होने पर गर्व’

प्रधानमंत्री के बयान के अगले ही दिन कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री पी. चिदंबरम ने सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने अंग्रेजी में लिखा, “I am proud to be a dimagi naxal!”

चिदंबरम का यह जवाब सीधे तौर पर प्रधानमंत्री की टिप्पणी पर राजनीतिक पलटवार माना जा रहा है। उनके बयान के बाद ‘दिमागी नक्सल’ शब्द को लेकर चल रही बहस और तेज हो गई।

जयराम रमेश ने भी उठाए सवाल

कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने प्रधानमंत्री के बयान की आलोचना करते हुए कहा कि ‘दिमागी नक्सल’ जैसी कोई स्पष्ट कानूनी परिभाषा नहीं है। उन्होंने इसे पहले इस्तेमाल किए गए ‘अर्बन नक्सल’ शब्द से जोड़कर देखा।

रमेश का आरोप है कि सरकार अपने राजनीतिक आलोचकों के लिए ऐसे शब्दों का इस्तेमाल करती है। उन्होंने यह भी कहा कि जिन मुद्दों को कभी ‘अर्बन नक्सल’ सोच बताकर खारिज किया गया, बाद में सरकार ने उन्हीं में से कुछ मांगों को स्वीकार किया।

M.A. बेबी ने भी जताई आपत्ति

माकपा महासचिव एम.ए. बेबी ने कहा कि उनकी पार्टी नक्सलवाद और हिंसक माओवादी राजनीति का समर्थन नहीं करती। हालांकि, उन्होंने प्रधानमंत्री के ‘दिमागी नक्सल’ वाले बयान को विपक्ष को निशाना बनाने की कोशिश बताया।

बेबी के मुताबिक, किसी व्यक्ति की वैचारिक असहमति को माओवादी मानसिकता बताना राजनीतिक रूप से सुविधाजनक आरोप हो सकता है। उन्होंने इसे आपत्तिजनक करार दिया।

नक्सलवाद और राजनीतिक असहमति की बहस

इस विवाद का एक अहम पहलू यह है कि सरकार जहां ‘दिमागी नक्सल’ शब्द को माओवादी विचारधारा के प्रभाव से जोड़ रही है, वहीं विपक्ष इसे राजनीतिक आलोचकों को निशाना बनाने वाला लेबल बता रहा है।

नक्सलवाद एक सशस्त्र राजनीतिक आंदोलन से जुड़ा विषय रहा है, जबकि लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार की नीतियों की आलोचना करना विपक्ष का संवैधानिक और राजनीतिक अधिकार है। इसी अंतर को लेकर अब राजनीतिक बहस तेज हो रही है।

स्वतंत्रता दिवस के भाषण से शुरू हुआ सियासी घमासान

प्रधानमंत्री का लाल किले से दिया गया भाषण आमतौर पर राष्ट्रीय मुद्दों और सरकार की प्राथमिकताओं का व्यापक खाका पेश करता है। इस बार नक्सलवाद और उसकी वैचारिक मौजूदगी का मुद्दा भी प्रमुखता से उठा।

लेकिन ‘दिमागी नक्सल’ शब्द ने भाषण के बाद एक अलग राजनीतिक बहस पैदा कर दी। एक तरफ सरकार इसे हिंसक नक्सलवाद के वैचारिक प्रभाव के खिलाफ चेतावनी बता रही है, दूसरी तरफ विपक्ष इसे असहमति की आवाजों को बदनाम करने की कोशिश मान रहा है। अब सवाल यही है कि यह शब्द आने वाले दिनों में भारतीय राजनीति की बहस को कितना प्रभावित करता है।


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पीयुष उपाध्याय एक अनुभवी समाचार संपादक हैं, जो Aware Media Network के लिए देश-दुनिया की प्रमुख खबरों, विश्लेषण और तथ्यात्मक रिपोर्टिंग सुनिश्चित करते हैं। उनका अनुभव पत्रकारिता में 7+ वर्षों का है और वे निष्पक्ष, भरोसेमंद और समय पर समाचार प्रदान करने के लिए प्रतिबद्ध हैं। उन्होंने कई पुरस्कार और मान्यता प्राप्त की है, जिनमें 2022 में “Best Investigative Journalist” और 2021 में “Top 10 Editors in Uttarakhand” शामिल हैं।
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