बिहार में शराबबंदी को लागू हुए करीब एक दशक हो चुका है, लेकिन इस कानून पर सियासी बहस थमने का नाम नहीं ले रही। अब पूर्व सांसद आनंद मोहन ने इसे असफल बताते हुए सीमावर्ती राज्यों, अवैध कारोबार और किसानों पर पड़ रहे असर को लेकर गंभीर सवाल उठाए हैं।
शराबबंदी पर फिर गरमाई सियासत
बिहार में शराबबंदी कानून को लेकर सत्ता और विपक्ष के बीच लंबे समय से बहस चलती रही है। केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी भी इसकी समीक्षा और गुजरात मॉडल पर विचार करने की मांग कर चुके हैं।
हालांकि बीजेपी, जेडीयू और एनडीए के कई नेता स्पष्ट कर चुके हैं कि बिहार में शराबबंदी जारी रहेगी। इसी बीच पूर्व सांसद आनंद मोहन के बयान ने इस बहस को फिर हवा दे दी है।
आनंद मोहन ने कानून को बताया असफल
गयाजी में मीडिया से बातचीत के दौरान आनंद मोहन ने बिहार की शराबबंदी को सफल नहीं माना। उन्होंने तर्क दिया कि बिहार की सीमाएं ऐसे राज्यों और नेपाल से लगती हैं, जहां शराबबंदी लागू नहीं है।
उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश, झारखंड और पश्चिम बंगाल में शराबबंदी नहीं है। ऐसे में सीमावर्ती इलाकों से शराब की तस्करी रोकना बड़ी चुनौती है।
‘समानांतर अर्थव्यवस्था पर विचार जरूरी’
आनंद मोहन ने आरोप लगाया कि शराबबंदी के समानांतर एक ऐसी अर्थव्यवस्था खड़ी हो गई है, जिसका असर राजनीति और प्रशासन तक दिखाई देता है।
उन्होंने कहा कि अवैध शराब के कारोबार से आने वाला पैसा स्थानीय स्तर से लेकर राजनीतिक व्यवस्था तक प्रभाव डाल सकता है। उनके मुताबिक, इस पहलू पर भी गंभीरता से विचार होना चाहिए।
हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
किसानों और जमीन की कीमत का मुद्दा
पूर्व सांसद ने शराबबंदी के साथ जमीन की कीमतों और किसानों की आर्थिक परेशानियों का मुद्दा भी जोड़ा। उन्होंने दावा किया कि जमीन के दामों में अचानक वृद्धि से जरूरत के समय किसानों के लिए जमीन बेचना मुश्किल हो सकता है।
उन्होंने सवाल उठाया कि अगर शराबबंदी से जुड़े आर्थिक प्रभावों का बोझ किसानों को उठाना पड़े और वे भविष्य में विरोध पर उतरें, तो सरकार को उससे पहले नीति की समीक्षा करनी चाहिए।
सरकार का रुख अब भी स्पष्ट
शराबबंदी की आलोचनाओं के बावजूद बिहार सरकार इसे खत्म करने के पक्ष में नजर नहीं आ रही। हाल ही में मद्य निषेध मंत्री मदन सहनी ने कहा कि यदि दूसरे राज्यों से बिहार में विदेशी शराब पहुंचती है तो संबंधित ब्रांड बनाने वाली कंपनियों के खिलाफ भी FIR दर्ज की जाएगी।
इससे सरकार का संकेत साफ है कि वह शराबबंदी को कमजोर करने के बजाय अवैध आपूर्ति रोकने के लिए कार्रवाई बढ़ाना चाहती है।
समीक्षा बनाम सख्ती की बहस
बिहार में शराबबंदी अब सिर्फ शराब की बिक्री रोकने का सवाल नहीं रह गई है। इसके साथ रोजगार, राजस्व, तस्करी, कानून-व्यवस्था और सामाजिक प्रभाव जैसे कई मुद्दे जुड़े हैं।
आनंद मोहन की मांग ने एक पुरानी बहस को फिर सामने ला दिया है—क्या शराबबंदी को और सख्ती से लागू किया जाए या उसके मौजूदा मॉडल की व्यापक समीक्षा हो? इसका जवाब आंकड़ों, जमीनी अनुभव और निष्पक्ष मूल्यांकन से ही मिल सकता है।
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