13 साल का लंबा इंतज़ार खत्म: प्राइम वीडियो पर आई ‘शाहिद’, पर को-राइटर अपूर्वा असरानी के ‘तीखे सवालों’ ने छेड़ी नई बहस
सिनेमाघरों में अपनी धमक दिखाने और नेशनल फिल्म अवॉर्ड्स जीतने के पूरे 13 साल बाद, निर्देशक हंसल मेहता की कल्ट क्लासिक फिल्म ‘शाहिद’ आखिरकार ओटीटी प्लेटफॉर्म प्राइम वीडियो पर स्ट्रीम हो गई है। लेकिन इस डिजिटल डेब्यू के साथ ही एक बड़ा विवाद भी खड़ा हो गया है। फिल्म के को-राइटर और एडिटर अपूर्वा एम. असरानी ने इस देरी को लेकर जो सवाल उठाए हैं, उन्होंने फिल्म जगत और सोशल मीडिया पर हलचल मचा दी है। अपूर्वा ने सीधे तौर पर पूछा है—क्या देश के बदलते राजनीतिक माहौल और ‘डर’ की वजह से इस फिल्म को इतने सालों तक किसी भी ओटीटी प्लेटफॉर्म पर जगह नहीं मिली?
सुलगते सवाल: क्या ‘असहमतियों’ की वजह से हुई देरी?
सोशल मीडिया पर साझा किए गए एक विस्तृत नोट में असरानी ने फिल्म की लंबी अनुपस्थिति पर गहरी चिंता जताई। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या ‘शाहिद’ जैसी फिल्म, जो असहमति और आरोपी के अधिकारों की बात करती है, मौजूदा राजनीतिक परिदृश्य में फिट नहीं बैठ रही थी?
अपूर्वा ने याद दिलाया कि ‘शाहिद’ वकील और मानवाधिकार कार्यकर्ता शाहिद आज़मी की वह साहसी कहानी है, जिन्होंने उन लोगों के लिए कानूनी लड़ाई लड़ी जिन्हें अक्सर निर्दोष साबित होने से पहले ही ‘दोषी’ मान लिया जाता था। इसी निडरता के कारण उनकी हत्या कर दी गई थी। असरानी ने लिखा, “मैं अक्सर सोचता हूं कि 2014 के बाद आए राजनीतिक माहौल में, जहां एक्टिविस्ट, पत्रकार और अधिकारों की रक्षा करने वाले लोग शक के घेरे में आ गए, क्या उसी वजह से ‘शाहिद’ को हाशिए पर रखा गया?” उन्होंने इस दौरान ट्रायल का इंतजार कर रहे उमर खालिद जैसे मामलों का भी जिक्र किया।
सिस्टम और ‘कोशर’ कहानियों पर तंज
अपूर्वा असरानी यहीं नहीं रुके; उन्होंने उन फिल्ममेकर्स और कलाकारों पर भी निशाना साधा जिन्हें उनके अनुसार ‘सिस्टम’ ने अपने साथ मिला लिया है। उन्होंने आरोप लगाया कि आज के दौर में ऐसी कहानियाँ बनाई जा रही हैं जो सिस्टम के हिसाब से सही यानी “कोशर” हों। उन्होंने तर्क दिया कि आजकल नेशनल अवॉर्ड्स भी कलात्मकता के बजाय राजनीतिक झुकाव के आधार पर दिए जा रहे हैं। उन्होंने सवाल पूछा, “तो अब क्यों? क्या माहौल बदल गया है या डर के खिलाफ विरोध बढ़ रहा है?”
हंसल मेहता की ‘व्यक्तिगत त्रासदी’
फिल्म के निर्देशक हंसल मेहता ने भी 2022 में अपनी निराशा व्यक्त की थी। उन्होंने फिल्म के किसी भी ओटीटी पर उपलब्ध न होने को एक “व्यक्तिगत त्रासदी” बताया था। मेहता ने कहा था कि उन्हें यह तक नहीं पता था कि फिल्म के अधिकार किसके पास हैं। ताज्जुब की बात यह है कि जिस फिल्म का प्रीमियर टोरंटो इंटरनेशनल फिल्म फेस्टिवल (TIFF) में हुआ और जिसने दो नेशनल अवॉर्ड जीते, उसे एक दशक से ज्यादा समय तक डिजिटल प्लेटफॉर्म के लिए संघर्ष करना पड़ा।
‘शाहिद’: एक बेमिसाल सफर
18 अक्टूबर 2013 को रिलीज हुई ‘शाहिद’ वकील शाहिद आज़मी के जीवन का आईना है। राजकुमार राव ने अपनी बेहतरीन अदाकारी से इसमें जान फूँक दी थी, जिसके लिए उन्हें नेशनल अवॉर्ड से नवाजा गया। फिल्म में मोहम्मद ज़ीशान अय्यूब और प्रभलीन संधू जैसे कलाकारों ने भी सशक्त भूमिकाएं निभाईं।
दुनियाभर के प्रतिष्ठित फिल्म फेस्टिवल्स (न्यूयॉर्क, दुबई, शिकागो, स्टटगार्ट) में सराहना बटोरने वाली इस फिल्म ने 61वें नेशनल फिल्म अवॉर्ड्स में दो बड़ी जीत दर्ज की थीं:
- हंसल मेहता: सर्वश्रेष्ठ निर्देशन
- राजकुमार राव: सर्वश्रेष्ठ अभिनेता
अब जब यह फिल्म प्राइम वीडियो पर उपलब्ध है, अपूर्वा असरानी ने इसे ‘साहसी सिनेमा’ की याद दिलाने वाला एक प्रोजेक्ट बताया है। वजह चाहे जो भी रही हो, लेकिन सिनेमा प्रेमियों के लिए ‘शाहिद’ का डिजिटल स्क्रीन पर आना एक बड़ी जीत है।
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