मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) पर द्रमुक का सुप्रीम कोर्ट में हल्लाबोल: लाखों मतों के छिनने का डर!
नई दिल्ली: तमिलनाडु की सत्ताधारी पार्टी द्रविड़ मुनेत्र कषगम (द्रमुक) ने सोमवार को भारतीय निर्वाचन आयोग के उस फैसले को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी है, जिसके तहत राज्य में मतदाता सूची का विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) कराया जा रहा है। द्रमुक ने इस कवायद को असंवैधानिक, मनमाना और देश के लोकतांत्रिक अधिकारों पर एक गंभीर चोट करार दिया है।
द्रमुक के संगठन सचिव आर. एस. भारती की ओर से दायर याचिका में, 27 अक्टूबर को निर्वाचन आयोग द्वारा जारी उस अधिसूचना को तत्काल रद्द करने की मांग की गई है, जिसने एसआईआर प्रक्रिया का मार्ग प्रशस्त किया था। पार्टी का तर्क है कि यह कदम भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), 19 (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) और 21 (जीवन का अधिकार) के साथ-साथ जनप्रतिनिधित्व अधिनियम और 1960 के मतदाता पंजीकरण नियमों का खुला उल्लंघन है।
वकील विवेक सिंह के माध्यम से दायर की गई इस याचिका पर इस सप्ताह न्यायालय में सुनवाई होने की पूरी संभावना है। याचिका में निर्वाचन आयोग के 27 अक्टूबर, 2025 के उस आदेश को भी तलब करने की मांग की गई है, जिसके तहत तमिलनाडु में विशेष गहन पुनरीक्षण का निर्देश दिया गया था।
लाखों मतदाताओं के “मनमाने ढंग से” हटाए जाने का आरोप:
याचिका की मुख्य चिंता यह है कि एसआईआर प्रक्रिया के तहत, अनुचित दस्तावेजीकरण की आवश्यकताओं और प्रक्रियात्मक सुरक्षा उपायों के अभाव के कारण लाखों पात्र मतदाताओं को “मनमाने ढंग से” मतदाता सूची से हटाया जा सकता है। द्रमुक का मानना है कि यदि इस एसआईआर और संबंधित आदेशों को तुरंत रद्द नहीं किया गया, तो लाखों मतदाता अपने प्रतिनिधियों को चुनने के अपने मौलिक अधिकार से वंचित हो जाएंगे। इससे देश की स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव व्यवस्था पर गंभीर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।
समय-सीमा और अस्पष्ट प्रक्रियाओं पर सवाल:
द्रमुक ने एसआईआर के लिए जल्दबाजी में तय की गई समय-सीमा और अस्पष्ट प्रक्रियाओं पर भी चिंता व्यक्त की है। पार्टी का मानना है कि इन कारणों से बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम गलत तरीके से हटाए जा सकते हैं, जो भारत के संवैधानिक ढांचे के एक महत्वपूर्ण स्तंभ – स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव – को बाधित करेगा।
नागरिकता साबित करने की अनिवार्यता पर विवाद:
द्रमुक की चुनौती का एक अहम बिंदु निर्वाचन आयोग द्वारा मतदाताओं, विशेषकर 2003 की मतदाता सूची में शामिल न होने वालों, के लिए नागरिकता साबित करने वाले दस्तावेज़ प्रस्तुत करने की अनिवार्यता है। याचिका में कहा गया है कि यह मतदाता सत्यापन प्रक्रिया, बिना किसी कानूनी आधार के, राष्ट्रीय नागरिक पंजी (एनआरसी) का रूप लेती जा रही है।
यह ध्यान देने योग्य है कि राज्य की मतदाता सूची को इससे पहले ही विशेष सारांश संशोधन (एसएसआर) के माध्यम से अद्यतन किया जा चुका है, जो जनवरी 2025 में पूरा हो चुका था। ऐसे में, एसआईआर की आवश्यकता पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं।
अन्य राज्यों में भी एसआईआर की तैयारी:
उल्लेखनीय है कि यह मामला ऐसे समय में सामने आया है जब देश के 9 राज्यों और 3 केंद्र शासित प्रदेशों में एसआईआर की कवायद शुरू होने वाली है, जिसमें लगभग 51 करोड़ मतदाताओं का सत्यापन किया जाएगा।
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