ठगी का नया अवतार: ‘डिजिटल अरेस्ट’ का खौफ और न्यायपालिका पर हमला
ऑनलाइन ठगी का एक नया और खतरनाक चेहरा सामने आया है, जिसे ‘डिजिटल अरेस्ट’ के नाम से जाना जाता है। इसमें शातिर जालसाज खुद को सरकारी एजेंसी या पुलिस अधिकारी बताकर लोगों को झूठे आरोपों में फंसाते हैं, धमकाते हैं और अवैध तरीके से पैसे ऐंठने की फिराक में रहते हैं।
देश की शीर्ष अदालत ने ऐसे कृत्यों की कड़ी निंदा करते हुए कहा है कि “न्यायाधीशों के जाली हस्ताक्षरों वाले न्यायिक आदेश तैयार करना, कानून के शासन के अलावा न्यायिक व्यवस्था में जनता के विश्वास की नींव पर कुठाराघात करता है। इस तरह की कार्रवाई संस्था की गरिमा पर सीधा हमला है।”
न्यायालय ने इस गंभीर आपराधिक कृत्य को धोखाधड़ी या साइबर अपराध के सामान्य अपराध मानने से इनकार कर दिया। पीठ ने जोर देकर कहा, “हम इस तथ्य का न्यायिक संज्ञान लेने के लिए भी इच्छुक हैं कि यह मामला एकमात्र मामला नहीं है। मीडिया में कई बार ये खबरें आई हैं कि देश के विभिन्न हिस्सों में ऐसे अपराध हुए हैं। इसलिए, हमारा मानना है कि न्यायिक दस्तावेजों की जालसाजी, निर्दोष लोगों, खासकर वरिष्ठ नागरिकों से जबरन वसूली/लूट से जुड़े आपराधिक उपक्रम का पूरी तरह से पर्दाफाश करने के लिए केंद्र और राज्य पुलिस के बीच समन्वित प्रयासों और कार्रवाई की आवश्यकता है।”
यह घटनाक्रम न केवल आम जनता के लिए चिंता का विषय है, बल्कि यह न्यायपालिका की गरिमा और विश्वसनीयता पर भी एक गंभीर सवाल खड़ा करता है। ऐसे गिरोहों को जड़ से उखाड़ने के लिए त्वरित और प्रभावी कार्रवाई की नितांत आवश्यकता है।
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