लद्दाख: आशाओं से निराशा तक का सफर, कांग्रेस ने उठाए सवाल
कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने लद्दाख की वर्तमान स्थिति पर चिंता व्यक्त करते हुए केंद्र सरकार पर तीखा प्रहार किया है। सोशल मीडिया पर जारी एक विस्तृत पोस्ट में, उन्होंने कहा कि छह साल पहले केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद लद्दाख के लोगों में जो उम्मीदें जगी थीं, वे आज गहरे निराशा और मोहभंग में बदल गई हैं।
जनता की प्रमुख चिंताएं:
जयराम रमेश ने लद्दाखवासियों की चार प्रमुख चिंताओं को रेखांकित किया:
- भूमि और रोज़गार का खतरा: स्थानीय लोगों को अपनी ज़मीन और रोज़गार के अधिकारों के छिन जाने का भय सता रहा है।
- लोकतांत्रिक संस्थाओं पर अंकुश: निर्वाचित निकायों और प्रशासन पर उपराज्यपाल और नौकरशाही का हावी होना जनता के लिए चिंता का विषय है।
- छठी अनुसूची पर अनिश्चितता: छठी अनुसूची के तहत संवैधानिक सुरक्षा और निर्वाचित विधायिका की मांग पर अब तक कोई ठोस निर्णय न लेना, लोगों को निराश कर रहा है। केवल बैठकें हो रही हैं, पर परिणाम शून्य।
- चीन से बढ़ती चुनौती: वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर चीन के लगातार उल्लंघन और प्रधानमंत्री द्वारा इस मुद्दे पर चीन को ‘क्लीन चिट’ दिए जाने की घटना ने स्थानीय आबादी में असुरक्षा और अनिश्चितता को बढ़ाया है।
सामरिक महत्व और वर्तमान संकट:
जयराम रमेश ने इस बात पर जोर दिया कि लद्दाख भारत के लिए सांस्कृतिक, आर्थिक, पारिस्थितिक और सामरिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण है। लद्दाख के लोग हमेशा से गौरवान्वित भारतीय रहे हैं, लेकिन वर्तमान परिस्थितियां उन्हें गहरे संकट और निराशा की ओर धकेल रही हैं।
ठोस कार्रवाई की अपील:
उन्होंने भारत सरकार से अपील की है कि लद्दाख के लोगों की पीड़ा और वेदना को समझा जाए। अब केवल बैठकों का समय नहीं है, बल्कि उनकी वैध आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए ठोस और वास्तविक प्रयास किए जाने चाहिए।
हालिया प्रदर्शन और मांगें:
हाल ही में लेह में हुए हिंसक प्रदर्शनों ने स्थिति की गंभीरता को दर्शाया, जिसमें चार लोगों की जान गई और दर्जनों घायल हुए। प्रदर्शनकारी लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा और छठी अनुसूची के तहत संवैधानिक सुरक्षा की मांग कर रहे हैं। केंद्र सरकार ने बातचीत का आश्वासन तो दिया है, लेकिन अभी तक कोई निर्णायक घोषणा नहीं की गई है।
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